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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नरेंद्र मोदी सरकार की पहली प्रतिक्रिया

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार कहना है कि कोर्ट ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है. यह लैंगिक बराबरी और सम्मान का मामला है.

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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नरेंद्र मोदी सरकार की पहली प्रतिक्रिया

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का केंद्र सरकार ने स्वागत किया है. तस्वीर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

खास बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक कहा है
  2. कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार ने किया स्वागत
  3. कहा, यह लैंगिक बराबरी और सम्मान का मामला है
नई दिल्ली: तीन तलाक के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का केंद्र सरकार ने स्वागत किया है. सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय और कानून मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संतोषजनक बताया है. सरकार कहना है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है. यह लैंगिक बराबरी और सम्मान का मामला है.सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री ने ये कभी नहीं कहा कि यह धर्म से जुड़ा मामला है. कोर्ट का यह फैसला हमारे रुख का समर्थन है. ध्यान रहे कि मंगलवार को कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि एक साथ तीन तलाक असंवैधानिक है.

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तीन तलाक पर छह महीने के लिए रोक लगा दी है. कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह तीन तलाक पर कानून बनाए. सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि केंद्र जो कानून बनाएगा उसमें मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून संबंधी चिंताओं का खयाल रखा जाएगा. केंद्र ने राजनीतिक दलों से अपने मतभेदों को दरकिनार रखने और तीन तलाक के संबंध में कानून बनाने में केन्द्र की मदद करने को कहा है. 

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कोर्ट ने कहा कि अगर छह महीने में कानून नहीं बनाया जाता है तो तीन तलाक पर शीर्ष अदालत का आदेश जारी रहेगा. कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक देशों में तीन तलाक खत्म किए जाने का हवाला दिया और पूछा कि स्वतंत्र भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता. कोर्ट में 3 जज इसे अंसवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे, वहीं 2 जज इसके पक्ष में नहीं थे. इससे पूर्व 11 से 18 मई तक रोजाना सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए बुधवार का दिन मुकर्रर किया था. 

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय में शादी तोड़ने के लिए यह सबसे खराब तरीका है. ये गैर-ज़रूरी है. कोर्ट ने सवाल किया कि क्या जो धर्म के मुताबिक ही घिनौना है वह कानून के तहत वैध ठहराया जा सकता है? सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि कैसे कोई पापी प्रथा आस्था का विषय हो सकती है.


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