NDTV इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट: भोपाल जेल से भागे सिमी के 8 सदस्‍य उस पहाड़ी तक कैसे पहुंचे...

NDTV इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट: भोपाल जेल से भागे सिमी के 8 सदस्‍य उस पहाड़ी तक कैसे पहुंचे...

खास बातें

  • एनडीटीवी इंडिया की टीम ने गांव के कई चश्मदीदों से बात की.
  • गांव के सरपंच ने बहुत अहम भूमिका अदा की- ग्रामीण
  • मोहन सिंह का कहना है कि मेरे पास फ़ोन आया था. पुलिस को हमने बताया.
भोपाल:

प्रतिबंधित संगठन सिमी के आठ सदस्‍यों का एनकाउंटर सवालों के घेरे में है. नए वीडियो सामने आ रहे हैं, लेकिन जो आठ क़ैदी मारे गए, वो उस पहाड़ी तक कैसे पहुंचे, जानिए एनडीटीवी इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट से...

ये खेजड़ा देव गांव है. इस गांव में लाल बत्ती वाली गाड़ियां आजकल ख़ूब आ रही हैं. दरअसल, इसी गांव के लोगों ने पुलिस को सूचना दी थी कि जेल से भागे सिमी के आठ सदस्‍य गांव में देखे गए है और वो आगे जा रहे हैं.

एनडीटीवी इंडिया की टीम ने गांव के कई चश्मदीदों से बात की. उन्होंने बताया कि उनके सरपंच मोहन सिंह मीणा को नज़दीक के गांव चंदरपुर से फ़ोन आया था कि कुछ संदिग्‍ध लोग उनके गांव की तरफ़ बढ़ रहे हैं.

जब हमने उनसे पूछा कि वो कौन हैं, तो बोले हमसे बात ना करो और हमारे पीछे नहीं आओ... सबने न्यूज़ टीवी पर देखी थी, इसीलिए संदेह गहरा हो गया." एक गांव वाले ने एनडीटीवी को यह बताया. दूसरे के मुताबिक़, गांव के सरपंच ने बहुत अहम भूमिका अदा की. हम भी मिलने गए मोहन सिंह मीणा से.

मोहन सिंह का कहना है कि 'मेरे पास फ़ोन आया था. पुलिस को हमने बताया. उन्होंने कहा कि आप उनसे कुछ दूर चलो और हमने वैसे ही किया.' वैसे गांववालों के मुताबिक़, ये क़ैदी जेल से निकलने के बाद खेतों से ही गुज़रते हुए इनके गांव पहुंचे.
 


एनडीटीवी की टीम ने भी वो रूट लिया. सबसे पहले पहुंचे डोबरा गांव जो राष्ट्रीय राजमार्ग-12 के पास पड़ता है. वहां से ये क़ैदी बंकड़ा नाल क्रॉस कर फिर हेली नदी से गुज़र कर खेजड़ा देव गांव पहुंचे.

गांववालों के मुताबिक़, ये क़रीब सुबह 10 बजे की बात है. लोग अपने खेतों में थे. क्‍योंकि उस समय बिजली की सप्लाई होती है, इसलिए खेतों में पानी दे रहे थे और पशुओं को चारा. इनके मुताबिक़ इन्हें कुछ लोकल सपोर्ट भी मिली है और इसकी तफ़तीश होनी चाहिए.

एक चश्मदीद करन सिंह ने कहा कि "ये लोग खेतों से जा रहे थे. किसी से बात नहीं कर रहे थे. सभी ने नए कपड़े पहने थे. उनके पास नए जूते और खाने को ड्राई फ़्रूट भी थे. साफ़ है कि बाहर से कोई उनकी मदद कर रहा था."

इन लोगों के मुताबिक़, एनकाउंटर हुआ तब करीब 2,000 गांववाले एनकाउंटर साइट के आसपास थे.

दूसरे चश्मदीद जितेंदर सिंह ने कहा कि "फ़ोर्स आ गई थी. 2,000 गांववाले मौके पर थे. पहाड़ के ऊपर फोर्स थी और नीचे लोकल पुलिस और गांववाले खड़े थे."

मोहन सिंह ने दलील दी कि "एनकाउंटर फ़र्ज़ी नहीं था. वहां बहुत लोग थे." यानी ये साफ़ है कि गांव वालों की सूचना पर पुलिस ने इन सभी को घेरा.

पर सवाल उन वीडियो को लेकर उठ रहे हैं कि क्या इन क़ैदियों ने पुलिस को गोली चलाने के लिए मजबूर किया? एक और चश्‍मदीद निर्मल सिंह ने कहा कि "वो हाथ ऊपर कर सरेंडर नहीं कर रहे थे. जब वो दोनों तरफ़ से घिर गए तो पुलिस को उकसा रहे थे."

एनकाउंटर के चश्मदीद अरविंद मीणा ने बताया कि "वो सब बहुत गाली दे रहे थे और ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे." इन लोगों का ये भी कहना है कि वीडियो भी गांववालों ने बनाए.

मोहन सिंह ने कहा कि 'आजकल हर बच्चे के पास नए से नया मोबाइल है.. किसने वीडियो बनाया क्या पता.' एक नौजवान ने कहा कि 'पहाड़ से सभी को विक्टरी साइन दिखा रहे थे. मैं भी वीडियो बनाता, लेकिन मैं लेट पहुंचा. उसके साथी ने कहा कि "यहां गोलियां चल रही थीं. मैंने तो वीडियो नहीं बनाया. हां कुछ इंटखेड़ी अचारपुरा के गांववालों ने वीडियो बनाए थे." वैसे कुछ लोगों ने ये भी बताया कि पुलिस ने कुछ फ़ोन ज़ब्त कर लिए थे और उनके वीडियो डिलीट करने के बाद फ़ोन वापस किए.

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उधर, सिमी के मामलों को कोर्ट में रेप्रेज़ेंट करने वाले वक़ील परवेज आलम का कहना है कि 'इन आठ क़ैदियों को जान-बूझकर जेल से भगाया गया. ये हत्या है, एनकाउंटर नहीं'.

इस बीच, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बता रही है कि ज़्यादातर क़ैदियों को कमर से ऊपर गोलियां लगीं. पुलिस ने साठ राउंड फायर किए, जबकि उनकी यानी क़ैदियों की तरफ़ से दो गोलियां चलीं. बहराल राज्य पुलिस ने एनकाउंटर की जांच के लिए SIT का गठन कर दिया है.