RTI का ऑनलाइन जवाब देने में चुनाव आयोग फिसड्डी, 1951 में से एक का भी नहीं दिया जवाब

दस्तावेज बताते हैं कि चुनाव आयोग में इस साल यानी 2017 में 30 सितम्बर तक 1951 आरटीआई ऑनलाइन लगाई गई लेकिन एक भी ऑनलाइन आरटीआई का जवाब आयोग ने नहीं दिया.

RTI का ऑनलाइन जवाब देने में चुनाव आयोग फिसड्डी, 1951 में से एक का भी नहीं दिया जवाब

चुनाव आयोग ने नहीं दिया एक भी ऑनलाइन आरटीआई का जवाब

नई दिल्ली:

सूचना के अधिकार को लेकर अक्सर यह आरोप लगता है कि सरकार इस कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, लेकिन सरकार ने आरटीआई के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया, ताकि आप इंटरनेट पर ही आरटीआई पूछ सकें. देश के चुनाव आयोग का हाल ये है कि वह ऑनलाइन आरटीआई का जवाब देता ही नहीं है. आयोग ने कहा है कि उसका सिस्टम ऑनलाइन काम नहीं करता है. दस्तावेज बताते हैं कि चुनाव आयोग में इस साल यानी 2017 में 30 सितम्बर तक 1951 आरटीआई ऑनलाइन लगाई गई लेकिन एक भी ऑनलाइन आरटीआई का जवाब आयोग ने नहीं दिया. आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल पर एक भी आरटीआई का जवाब नहीं दिया, जबकि दूसरे विभाग कम ही सही लेकिन ऑनलाइन कुछ जवाब तो देते ही हैं. ये सूचना अधिकार के प्रयोग के लिए बनाया गया ऑन लाइन पोर्टल है जिस पर ऑनलाइन जानकारी मांगी जाती है और तमाम विभाग जानकारी देते भी हैं. लेकिन देश के चुनाव आयोग की कहानी इस बारे में बिल्कुल अलग है.

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चुनाव आयोग के अधिकारी कहते हैं कि तकनीकी वजहों से उसका सिस्टम ऑनलाइन आरटीआई से नहीं जुड़ा है. हालांकि चुनाव आयोग कहता है कि परम्परागत तरीके से डाक से भेजी गई आरटीआई का जवाब दिया जा रहा है और इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच डाक से आई 800 आरटीआई निपटाई भी गई हैं. आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा कहते हैं कि उन्होंने कार्मिक मंत्रालय से इस बारे में सवाल पूछा तो पता चला कि पिछले साल 2016 फरवरी में कार्मिक मंत्रालय ने चुनाव आयोग से ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल शुरू करने को कहा था. आयोग ने तपस कुमार नाम के अधिकारी को इसके लिए नियुक्त भी किया. फिर ऑनलाइन आरटीआई के लिए मई में आयोग के अधिकारियों की ट्रेनिंग भी कराई गई, लेकिन एक भी आरटीआई का जवाब आयोग ने अब तक नहीं दिया है.

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आयोग कहता है कि वह नेशनल इन्फोर्मेटिक सेंटर के साथ मिलकर ऑनलाइन समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहा है लेकिन अब तक कभी चुनाव आयोग ने ये बात सार्वजनिक रूप से नहीं कही, जबकि 2000 से अधिक आरटीआई आज तक आयोग से ऑन लाइन पूछी जा चुकी हैं और आम जनता का करीब 20 हजार रुपया इस पर खर्च हो चुका है.

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ऐसे वक्त में जब सूचना के अधिकार को लगातार कमज़ोर करने की कोशिशों के आरोप लगते हैं, वहीं तकनीक के इस्तेमाल में खुद को अव्वल कहने वाला चुनाव आयोग ऑनलाइन आरटीआई को लेकर जो रुख दिखा रहा है, वह हैरान करने वाला है.

 
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