NDTV Exclusive: विक्रम लैंडर का अफसोस नहीं, गम है कि ढाई लाख 'विक्रम' अपनी मांओं की गोद में मर रहे- सोनम वांगचुक

शिक्षाविद और समाजसेवी सोनम वांगचुक से NDTV की खास बातचीत, कहा- साइंस की ऊंचाई में ही नहीं गहराई में भी फैलाव की जरूरत

खास बातें

  • विकास के नाम पर यदि विनाश हो तो पहाड़ों पर यह 10 गुना ज्यादा नुकसानदेह
  • हमें हक नहीं कि सिर्फ मानव का विकास करें, बाकी जीव-जंतुओं का विनाश करें
  • युवा वर्ग कक्षा में कम, बाहर ज्यादा सीखे और समय व्यतीत करे
नई दिल्ली:

शिक्षाविद और समाजसेवी सोनम वांगचुक ने धारा 370 हटाए जाने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने का स्वागत किया है लेकिन साथ ही उन्होंने NDTV से बातचीत में आगाह किया कि विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए. साथ ही सोनम वांगचुक ने कहा कि उन्हें इस बात का गम नहीं कि विक्रम लैंडर चांद पर नहीं उतर पाया बल्कि गम इस बात का है कि विज्ञान की मामूली सी जानकारी के अभाव में ढाई लाख बच्चे अपनी मां की गोद में दम तोड़ रहे हैं.

सोनम वांगचुक से लद्दाख में उनके द्वारा शिक्षा को लेकर किए जा रहे नवाचार, पर्यावरण से लेकर विज्ञान और लद्दाख के विकास सहित कई मुद्दों पर हुई बातचीत के प्रमुख अंश -

NDTV: वांगचुक सर यहां लद्दाख में वैकल्पिक विश्वविद्यालय शुरू करने का आइडिया आया कहां से आया?

वांगचुक : जो यहां पर आप देख रहे हैं वह तो है हमारा वैकल्पिक विश्वविद्यालय. पहले जो हमारे वैकल्पिक विद्यालय में जब देखा कि बच्चे जिन्दगी से कटकर, हटकर किताबों में ही पढ़ते हैं तो उनकी रुचि उसमें नहीं जाती. कुछ की जाती है, ज्यादा की नहीं जाती. उन्हें याद रखना लिखना मुश्किल होता है. जिंदगी से जुड़ी नहीं होती इसलिए वहां पर हम करते हुए सीखने के लिए खेती से लेकर भवन निर्माण तक करते रहे. उससे देखा कि यहां तक कि 'टीन एजर' बच्चे हैं 10 वीं के, उनमें भी बहुत फर्क आता है, सीखने की रुचि वगैरह. आप समझ सकते हैं जो विश्वविद्यालय है जहां 20-22 साल के युवा आते हैं. उनमें तो और भी एनर्जी होती है, काबलियत होती है कुछ करने की. उन्हें अगर एक कक्षा में बंद रखें तो एक तरह से यह जुर्म है कि जो बबलिंग विथ यूथ होते हैं उन्हे हम बंद रखते हैं. तो हमने फिर सोचा कि इसी धारणा को लेकर विश्वविद्यालय के स्तर पर एक परीक्षण करना चाहिए, कि क्या ये सफल होता है. युवा कक्षा में कम, बाहर ज्यादा सीखें और समय व्यतीत करें... तो यहां जो हिमालयन ऑल्टरनेटिव यूनिवर्सिटी है, यहां पर हम हिमालय के परिवेश में हैं. एक समस्या यह है कि दूसरे विश्वविद्यालयों में परिवेश नहीं होता है. कहीं भी हो, चाहे लद्दाख में हो या राजस्थान में, शिक्षा वही रहती है. तो यहां पहाड़ों में क्या समस्याएं हो रहीं हैं जिनका लोगों को सामना करना पड़ रहा है. उनका समाधान यह युवा बड़ों के साथ मिलकर सीखते हुए कर पाए, उसको देखते हुए, इस स्कूल का जो अनुभव था, उसको देखते हुए ये आइडिया आया कि इस तरह के विश्वविद्यालय की शुरुआत होनी चाहिए.

NDTV: कल आपका लेक्चर मैं सुन रहा था कि किस तरह ORS बनाना जरूरी है, वो सीखना जरूरी है, बजाए कि चंद्रयान पर कुछ भेजा जाए. वो क्या वाकया आप सुना रहे थे?

वांगचुक : नहीं वो था बच्चों में साइंस एंड टेक्नोलॉजी के लिए जिज्ञासा और दिलचस्पी जगाना.  तो मैं यह कह रहा था कि जहां साइंस एंड टेक्नोलॉजी ड्रोन, रोबोट और चंद्रयान की तरफ जा रहा है, अच्छी बात है. लेकिन इस कीमत पर नहीं कि जो नीचे के लोग हैं, आम लोग हैं, उनको साइंस कितना दे पाता है?  उनके बच्चे इस वजह से मर रहे हैं कि जब उन्हें दस्त लगता है, डायरिया होता है, तो चुटकी भर नमक और तीन चुटकी चीनी देनी चाहिए, यह छोटी सा साइंस का ज्ञान न होने से ढाई लाख दूध पीते बच्चे मर रहे हैं. मुझे गम नहीं है कि एक विक्रम अगर चंद्रमा पर नहीं उतर पाया, मुझे गम है कि ढाई लाख 'विक्रम' अपनी माओं के गोद में मर रहे हैं. तो साइंस यह भी है. इस साइंस को भूल न जाएं. उस आकाश के साइंस के पीछे जाकर साइंस की ऊंचाई में ही नहीं गहराई में भी फैलाव की जरूरत है.  

NDTV: वांगचुक सर हम लेह में हैं तो यह सवाल लाजमी है कि जो 370 का मसला है इस पर आपकी क्या राय है?

वांगचुक: लद्दाख के लिए कहूंगा कि लद्दाख का यूटी (केंद्रशासित प्रदेश) बनना 370 की वजह से रुका हुआ था. उस लिहाज़ से यह लद्दाख के लिए खुशी की बात है कि इससे उसको पुराना हक मिला.
 

NDTV: लेकिन यह इलाका अब खुल गया तो अब एनवायरांमेंटलिस्ट होने के नाते आपको भी डर है कि अब यहां भी बेवजह का विकास होगा, बाहरी लोग आएंगे, कुछ ऐसी आशंकाएं भी हैं?

वांगचुक: बिल्कुल मुझे डर है, आशंकाएं हैं कि अगर हम विकास के नाम पर विनाश करते जाएं तो पहाड़ों पर यह 10 गुना ज्यादा विनाशक होगा. यहां से करोड़ों लोगों के लिए पीने का पानी जाता है. अगर ग्लेशियर पिघलते हैं तो यहां खनन होगा. इससे बहुत बुरा हाल होगा, हमारा ही नहीं बल्कि सभी लोगों का. और डर मुझे सिर्फ़ बाहर के लोगों से ही नहीं बल्कि लद्दाख के लोगों से भी है. अगर लद्दाख के लोग भी लोभ में आए टूरिज़्म के नाम पर, इंडस्ट्री के नाम पर, जिससे एनवायरांमेंट का विनाश हो, तो वो सबके लिए बुरा होगा. हमारा कोई हक नहीं है कि सिर्फ मानव का विकास करें, और बाकी सब जीव जंतुओं का विनाश करें.

NDTV: यहां आप पौधे उगाने की कोशिश कर रहे हैं. इससे तो एक क्रांति हो जाएगी?

वांगचुक: यह वे पौधे हैं जो यहां के नेटिव हैं. और हां अगर ऐसे में जब जलवायु परिवर्तन हो रहा है, अगर यह पौधे लगकर बड़े हो जाते हैं तो यह एक क्रांति ही होगी. आज पौधे बहुत जरूरी हैं, पानी को बाढ़ बनने से रोकने के लिए.

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NDTV: लेह की बात करें तो बहुत कम आबादी है, 1.5 लाख की, और अभी से आप पानी की किल्लत की बात करते हैं. अब जब यह सबके लिए खुल गया है तो कैसे सस्टेन करेंगे?

वांगचुक: इसके लिए हम स्टडी कर रहे हैं. क्या-क्या प्रावधान उन राज्यों में हैं, जहां पर जनजातीय आबादी है या और यूनियन टेरिटरीज़ में हैं. जो उनमें से बेहतरीन हैं, उनको हम यहां ला सकें. इसको रेगुलेट करें, नियंत्रण करें, खुलेआम न करें. चाहें शेड्यूल 6 हो या कोई और प्रावधान, जैसे अंडमान निकोबार में प्रेसिडेंशिअल डिक्रीस है. जहां जो भी अच्छा है उसको समझकर लद्दाख के लिए जो बेस्ट होगा उसको लेंगे. आज की लद्दाख की पीढ़ी ही अगर कल की आने वाली पीढ़ी का खाकर खत्म कर देगी तो यह भी तो गलत है ना. तो ये बाहर अंदर से ज्यादा एनवायरांमेंट को कैसे बचाए रखें, उसकी बात है.

 
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