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आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जोरों पर, जानिए- क्या है राफेल सौदे का सच?

राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर लग रहे तमाम आरोपों में कुछ बड़े आरोपों की पड़ताल के बाद एक अलग ही तस्वीर सामने आई

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आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जोरों पर, जानिए- क्या है राफेल सौदे का सच?

राफेल को असेंबल करने के लिए दसां और रिलायंस नागपुर के नजदीक मिहान एसईजेड में एक संयंत्र स्थापित कर रहे हैं.

खास बातें

  1. राहुल गांधी के विभिन्न ट्वीट में कथित घोटाले की राशि अलग-अलग
  2. सरकार का यूपीए की तुलना में 20 फीसदी कम दामों पर खरीद का दावा
  3. दसां एविएशन भारत में निर्माण पर गुणवत्ता नियंत्रण का जिम्मा नहीं लेता
नई दिल्ली:

राफेल का सच क्या है? क्या यह सच इस बात से तय होगा कि आप राजनीतिक विचारधारा को बांटने वाली रेखा के किस ओर खड़े हैं? ऐसा क्यों होता है कि राजनीतिक पार्टियां सत्ता में रहते हुए कुछ कहती हैं और विपक्ष में आने के बाद कुछ और? राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर लग रहे तमाम आरोपों में कुछ बड़े आरोपों की पड़ताल के बाद एक अलग ही तस्वीर सामने आई है. सबसे बड़ा आरोप कीमतों को लेकर है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अलग-अलग ट्वीट में इस घोटाले के आकार के बारे में अलग-अलग बातें कर रहे हैं. 16 मार्च 2018 को ट्वीट में उन्होंने कहा कि दसां ने रक्षा मंत्री के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है और अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमत बताई है. जिसके मुताबिक कतर को 1319 करोड़, मोदी सरकार को 1670 करोड़ और मनमोहन सिंह सरकार को 570 करोड़ रुपये में देने की बात है. राहुल के गणित के मुताबिक हर हवाई जहाज पर 1100 करोड़ रुपया ज्यादा दिया गया जो कि 36 विमान के हिसाब से छत्तीस हजार करोड़ रुपया है जो रक्षा बजट का दस फीसदी है.

इसके बाद दूसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल सौदे की वजह से सरकारी खजाने को चालीस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. कुछ दिनों बाद आए राहुल के ट्वीट में उन्होंने इसे 58 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया. हाल ही में उन्होंने अपने एक ट्वीट में इसे एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया.


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तो हकीकत क्या है? सरकारी सूत्रों के मुताबिक पहली बात तो यह है कि यूपीए के वक्त राफेल का कोई सौदा हुआ ही नहीं. कीमतों की तुलना करने पर भी एक अलग तस्वीर सामने आती है. अगर सिर्फ हवा में उड़ने लायक लड़ाकू विमान की कीमत की बात करें, जिस पर कोई भी मारक हथियार, रडार या दूसरे आयुध सिस्टम नहीं लगे हैं, तो सबसे पहले यूपीए-एक के समय रफाल के सौदों पर चर्चा शुरू हुई जिसमें अकेले विमान की कीमत 538 करोड़ रुपये थी. मई 2015 में यूपीए के लिए यही कीमत 737 करोड़ रुपये प्रति विमान होती जबकि एनडीए ने 670 करोड़ रुपये में सौदा किया. सितंबर 2019 में जब पहला विमान आएगा तब यूपीए के सौदे के हिसाब से कीमत 938 करोड़ रुपये होती जबकि एनडीए के सौदे के हिसाब से यह 794 करोड़ रुपये बैठेगी.

यह गणना यूरो के बदले रुपये के बदलते मूल्य के हिसाब से की गई है. सरकारी सूत्रों के अनुसार इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि अकेले हवा में उड़ने लायक विमान को एनडीए ने यूपीए की तुलना में 20 फीसदी कम दामों पर खरीदा है.

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दूसरा बड़ा आरोप यह है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा करते समय भारत की अपनी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को नजरअंदाज कर दिया गया. अप्रैल 2015 में पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा से सत्रह दिन पहले का एक वीडियो कांग्रेस ने जारी किया जिसमें दसां एविएशन के चेयरमैन कहते दिख रहे हैं कि भारत में एचएएल की ओर से 108 राफेल लड़ाकू विमान बनाने का करार जल्द होने वाला है. तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर ने 8 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि एचएएल बातचीत में शामिल है. सवाल है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एचएएल इस करार से बाहर हो गया और भारत ने सीधे 36 लड़ाकू विमान फ्रांस से खरीदने का करार कर लिया.

आला सरकारी सूत्रों के अनुसार दसां एविएशन और एचएएल के बीच बात नहीं बनी. दोनों पक्षों के बीच टेक्नॉलाजी ट्रांसफर एक बड़ा मुद्दा था. साथ ही दसां एविएशन भारत में बनने वाले 108 लड़ाकू विमानों की गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था. दसां एविएशन भारत में विमान बनाने के लिए तीन करोड़ मैन आवर का अंदाजा था तो वहीं एचएएल का आकलन इससे कहीं तीन गुना अधिक था जिससे कीमत कई गुना ज़्यादा हो जाती. ऐसे अनसुलझे मुद्दों के चलते ही यह सौदा बरसों से लटका हुआ था.

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एक तीसरा आरोप लगाया गया कि मोदी सरकार एचएएल की अनदेखी कर रही है. इस पर सरकारी सूत्रों का कहना है कि यूपीए के वक्त किए जा रहे सौदे में भी एचएएल को शामिल नहीं किया गया था. यूपीए के वक्त तैयार विमान खरीदने की बात थी और बाकियों को भारत में बनाने की. लाइसेंस लेकर बनाने में और टेक्नॉलाजी ट्रांसफर में फर्क है. भारत में बनाने से कीमत अधिक आती. यूपीए के वक्त भी एचएएल को लेकर चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी. एचएएल को यूपीए के वक्त हर साल औसत तौर पर दस हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए गए. जबकि मोदी सरकार ने हर साल औसत 22 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए. 83 लाइट काम्बेट एयरक्राफ्ट बनाने का पचास हजार करोड़ का ऑर्डर भी मोदी सरकार ने एचएएल को दिया है. अभी वे साल में सिर्फ आठ बना रहे हैं, उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का प्रयास हो रहा है.

चौथा बड़ा आरोप है कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस इंड्रस्ट्रीज की मदद की और इसे रफाल के निर्माता दसां एविएशन से ऑफसेट कांट्रेक्ट दिलवाया. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद इस आरोप ने तेजी पकड़ी. हालांकि बाद में ओलांद ने सफाई दी कि यह दो कंपनियों के बीच का करार था. इस पर सरकारी सूत्रों का कहना है कि ऑफसेट का नियम यूपीए ने 2006 में बनाया था. ऑफसेट के लिए सिर्फ एक कंपनी नहीं है. दसां एविएशन के मुताबिक उसने 72 भारतीय कंपनियों से करार किया है. छोटी बड़ी कंपनियों को तीन अरब यूरो से अधिक का काम मिलेगा. इससे रोजगार के नए अवसर मिलेंगे. एयरफ्रेम बनाने के लिए 20 कंपनियों से करार हो गया जबकि 14 से विचारधीन है. एयरो इंजिन के लिए पांच कंपनियों से करार हुआ. रडार, ईडब्ल्यू और एवियोनिक्स इंटीग्रेशन के लिए 13 से करार हुआ. एयरोनॉटिकल पुर्जों और उपकरण के लिए 14 से हो गया दो से विचाराधीन है. इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर और सेवाओं के लिए 20 कंपनियों से करार हुआ.

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जहां तक रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्रीज का सवाल है आला सरकारी सूत्रों के अनुसार तब भी दसां एविएशन और रिलायंस के बीच करार हुआ था. बाद में परिवार में विभाजन के कारण डिफेंस का काम छोटे भाई अनिल अंबानी के पास आ गया. बाद में हुए समझौते के तहत रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के 51 फीसदी और दसां एविएशन के 49 फीसदी भागीदारी के साथ साझा उपक्रम बनाया गया. ओलांद का बयान आने के बाद दसां कह चुका है कि 2016 के डीपीपी नियमों के तहत और मेक इन इंडिया नीति के मद्देनजर उसने रिलायंस के साथ समझौता किया.

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दसां और रिलायंस मिलकर नागपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नजदीक मिहान एसईजेड में एक संयंत्र स्थापित कर रहे हैं. इसके लिए दसां एविएशन ने सौ मिलियन यूरो का निवेश किया है जो भारत में किसी एक जगह पर रक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा निवेश है. वहां रफाल और फाल्कन विमानों के लिए फाइनल एसेंबली बनाई जाएगी.



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