प्रशांत किशोर की बयानबाजी के बीच नीतीश कुमार और सुशील मोदी की ये तस्वीरें सब कुछ बोल रही हैं

नव वर्ष के उपलक्ष्य में शुभकामना देने के लिए मुख्यमंत्री के निवास पर यों तो हर राज्य के राजधानी में नेताओं, अधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी रहती है. लेकिन बिहार की राजधानी पटना में मुख्यमंत्री आवास का एक फ़ोटो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है.

प्रशांत किशोर की बयानबाजी के बीच नीतीश कुमार और सुशील मोदी की ये तस्वीरें सब कुछ बोल रही हैं

मुख्यमंत्री आवास का एक फ़ोटो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है.

खास बातें

  • तस्वीरों ने दिया संदेश
  • गठबंधन में सब ठीक है
  • तस्वीरें बनीं चर्चा का केंद्र
पटना:

नव वर्ष के उपलक्ष्य में शुभकामना देने के लिए मुख्यमंत्री के निवास पर यों तो हर राज्य के राजधानी में नेताओं, अधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी रहती है. लेकिन बिहार की राजधानी पटना में मुख्यमंत्री आवास का एक फ़ोटो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है. जिसमें मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार अपने उप मुख्य मंत्री सुशील मोदी से गर्मजोशी से मिल रहे हैं. राजनीतिक गलियारे में सब लोग अपने अपने तरीक़े से इस फ़ोटो का अर्थ निकाल रहे हैं. लेकिन इस फ़ोटो की गर्माहट इस साल के विधानसभा चुनाव के एक सच को फिर से दोहराती है कि नीतीश बीजेपी के साथ ही मिलकर चुनाव लड़ेंगे. ये बात खुद सुशील मोदी हों या राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी कई बार दोहरा चुके हैं कि नीतीश के ही नेतृत्व में चुनाव मैदान में जाएंगे. यहां तक कि नीतीश की आलोचना कर अपनी राजनीति चमकाने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कुछ दिन पहले ही माना कि बिहार में एनडीए के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार और सुशील मोदी हैं और किसी की कोई राजनीतिक हासियत नहीं हैं.  

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नीतीश के लिए सबसे सुखद बात इस गर्मजोशी से मिलने के पीछे ये भी रही कि जब प्रशांत किशोर ने अधिक सीट पर हिस्सेदारी की बात उठायी तो किसी ने भी इस मांग का समर्थन नहीं किया बल्कि सबने प्रशांत किशोर के खिलाफ ही अपना विरोध जताया. नीतीश को भी मालूम हैं कि प्रशांत किशोर का नाम सुनते ही ना केवल बीजेपी बल्कि उनकी पार्टी के नेताओं जैसे आरसीपी सिंह के चेहरे पर तनाव आ जाता है. इसलिए सीटों पर समझौता हो जाने के बाद नीतीश जब भी अपने पार्टी के राष्ट्रीय कमेटी का गठन करेंगे तो उसमें शायद पीके यानी अब जगह नहीं देंगे. 

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अपने सहयोगी बीजेपी के साथ कोई दरार ना हो इसलिए माना जाता हैं कि नीतीश ने झारखंड में नयी सरकर बनने के बाद हेमंत सोरेन को बधाई तक नहीं दी. हालांकि झारखंड में भ्रष्टाचार के आरोपियों को जिस तरह से दूसरे दलों से लाकर टिकट दिया है उससे उनकी तेजस्वी यादव या लालू यादव के ख़िलाफ़ ये मुद्दा कमजोर ही हुआ है.  
 

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