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लोग मुझ पर जो पत्थर फेंकते हैं, मैं उन्हीं से पथ बना लेता हूं : लंदन में PM नरेंद्र मोदी

ब्रिटेन के अपने दौरे में पीएम मोदी सिर्फ यहीं भारतीयों को संबोधित करेंगे. इस पूरे इवेंट का नाम 'भारत की बात, सबके साथ' था.

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लोग मुझ पर जो पत्थर फेंकते हैं, मैं उन्हीं से पथ बना लेता हूं : लंदन में PM नरेंद्र मोदी

लंदन के ऐतिहासिक वेस्‍टमिंस्‍टर सेंट्रल हॉल में पीएम मोदी

खास बातें

  1. 'नीति और नीयत साफ होने से मिलते हैं पिरणाम'
  2. 'कुछ लोग निराशाजनक बात ही करेंगे'
  3. 'मैं सकारात्‍मक पक्ष की ओर देखता हूं'
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंग्लैंड के सेंट्रल हॉल वेस्टमिंस्टर में भारतीय मूल के नागरिकों को संबोधित किया. ब्रिटेन के अपने इस दौरे में पीएम मोदी पहली बार भारतीय मूल के लोगों को संबोधित कर रहे थे. इस पूरे इवेंट का नाम 'भारत की बात, सबके साथ' था. गौरतलब है कि जिस हॉल से पीएम मोदी ने लोगों को संबोधित किया उसका अपना एक अनोखा इतिहास है. दरअसल, यह हॉल पहले मेथोडिस्ट सेंट्रल हॉल के नाम से जाना जाता था. यह लंदन के सबसे बड़े मल्टी परपस वेन्यू में से एक है. यहां 1946 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र सभा का आयोजन किया गया था. इसी हॉल में वर्ष 1931 में महात्मा गांधी ने भाषण दिया था. महात्मा गांधी के अलावा मार्टिन लूथर किंग, दलाई लामा और प्रिंसेस डाइना भी यहां भाषण दे चुके हैं.

लंदन के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल, वेस्‍टमिंस्‍टर में पीएम मोदी ने भारतीय समुदाय के सामने अपनी बात रखी. इस कार्यक्रम को नाम दिया गया था भारत की बात सबके साथ. गीतकार प्रसून जोशी के सवाल पर पीएम मोदी ने कहा कि 'रेलवे स्‍टेशन मेरे संघर्ष का गवाह, रेलवे स्‍टेशन पर रहकर जूझना सीखा.'

पीएम मोदी ने कहा, मैं सबसे पहले तो आप सबका आभारी हूं. रेलवे से रॉयल पैलेस की तुकबंदी आपके लिए सरल है लेकिन मेरे लिए यह रास्ता काफी कठिन था. जहां तक रेलवे स्टेशन की बात है तो वह मेरी अपनी व्यक्तिगत कहानी है. वह मेरी जिंदगी के संघर्ष का दौर था. उसने मुझे जीना और जूझना सीखया. और जिंदगी अपने लिए औरों के लिए हो सकती है. ये मैनें बचपन से सीखा समझा. रॉयल पैलेस यह नरेंद्र मोदी का नहीं है. यह मेरी कहानी नहीं है. यह रॉयल पैलेस सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी के संकल्प का परिणाम है. रेल की पटरी वाला मोदी ही मोदी है. रॉयल पैलेस वाला मोदी एक सेवक है. यह हमारे लोकतंत्र की ताकत है. लोकतंत्र में जनता जो ईश्वर का रूप है अगर वह फैसला कर ले तो एक चाय बेचने वाला भी उनका प्रतिनिधित्व करके रॉयल पैलेस पहुंच सकता है.

मैं इस सिद्धांत को मानता हूं- जहां मैं नहीं तू ही तू है, जहां द्वै नहीं है द्वंद नहीं है. जहां द्वैत नहीं है और इसलिए मैं मेरे भीतर के नरेंद्र मोदी को लेकर जाता हूं तो शायद मैं देश के साथ अन्याय करूंगा. देश के साथ न्याय तब होता है जब अपने आप को भुला देना होता है. बीज भी तो खप ही जाता है, मैं भी खप जाता हूं जब बाहर जाता हूं.

प्रशांत दीक्षित का सवाल- बहुत काम हो रहा है, रेलवे लाइन बीछ रही है रोड बन रहे है, फिर भी बेसब्री क्यों है?

जवाब - जिस पल संतोष का भाव पैदा हो जाता है. तो जिंदगी कभी आगे बढ़ती नहीं है. हर आयु में, युग में, हर अवस्था में कुछ न कुछ नया करने या नया पाने का मकसद गति देता है. वर्ना तो जिंदगी रुक जाती है. और कोई कहता है बेसब्री बुरी चीज है तो मैं समझता हूं कि वह बूढ़े हो चुके हैं. मेरे हिसाब से बेसब्री जरूरी है. जिसके घर में साइकिल है तो वह स्कूटर लेना चाहता है. अगर यह नहीं है तो जो है वह भी चला जाएगा, मुझे खुशी है कि आज सवा सौ करोड़ देशवासियों के मन में आशा ऊभर कर आ रही है. हमनें ऐसा माहौल बनाया है कि लोग हमसे ज्यादा अपेक्षा कर रेह हैं. आज से 15 से 20 साल पहले जब आकाल होता था तो गांव के लोग सरकारी दफ्तर में मेमोरेंडम देते थे. कहते थे कि आकाल हो जाए हमारे यहां मिट्टी खोदने का काम दें. उस समय उतनी ही बेसब्री थी. सिर्फ आकाल आने और मिट्टी के गड्ढे खोदने की बेसब्री थी. आज सिंगल रोड वाला डबल रोड बनाने को कहता है. जिसके पास डबल रोड है वह हाईवे की मांग करते हैं. देश मुझसे ज्यादा अपेक्षा इसलिए रखता है क्योंकि देशवासियों को लगता है कि आज नहीं तो कल यह जरूर काम करेगा. जो काम करता है उसी से अपेक्षा की जाती है. पहले ऐसा नहीं था. आज हम हर दिन तीन गुना रास्ता बना रहे हैं. पहले जितना काम होता था आज उससे तीन गुना ज्यादा कर रहे हैं, चाहे बात रेल पटरी बिछाने की हो या फिर शौचालय बनाने की.

बेसब्री खत्म हो जाएगी उस दिन मैं खत्म हो जाऊंगा. जब सोता हूं तो दूसरे दिन का सपना लेकर सोता हूं. जहां तक निराशा का सवाल है तो मैं समझता हूं जब खुद के लिए कुछ लेना, पाना, बनना होता है तब निराशा का भाव आता है, लेकिन जब आप सभी को लेकर चलते हैं तो आप निराश नहीं हो सकते. कुछ लोगों को लगता है सरकार बेकार है, अधिकारी बेकार हैं. मैं दूसरे तरह का इंसान हूं. अब आप देखिय वही सरकार वही अधिकारी लेकिन अगर आप चार साल का लेखाजोखा लेंगे तो आप दूसरी सरकार की तुलना में हमारी तुलना करेंगे तो आपको ध्यान में आएगा कि तब की निर्णय प्रक्रिया में अब के प्रक्रिया में जमीन आसामान का फर्क दिखेगा. अगर आपके पास नीति स्पष्ट है, इरादे साफ हों और सभी का हित करने का इरादा हो तो आप इच्छित परिणाम ला सकते हैं. मैं जो चाहूं वह सभी तो नहीं होता लेकिन जो नहीं हुआ उसके बाद भी निराश नहीं होता हूं.

प्रियंका वर्मा, दिल्ली से - हम सरकार क्यों चुनते हैं? लेकिन जब से आप आए तब से सिस्टम बदल ही गया है. आपने सरकार के साथ-साथ हमें भी काम पर लगा दिया है. ऐसा पहले क्यों नहीं होता था?

जवाब- प्रियंका का सवाल अच्छा है. आप 1857 से 1947 तक देखिए, आप कोई भी साल उठाकर देखिए, कोई न कोई देश की आजादी के लिए शहीद हुआ है. किसी न किसी ने इस दौरान अपनी जिंदगी जेल में बिता दी. मतलब आजादी का संघर्ष कहीं रुका नहीं था. लेकिन महात्मा गांधी ने क्या किया, उन्होंने इस पूरी भावना को नया रूप दे दिया. उन्होंने जन भावना को जोड़ा. आम लोगों को अपने से जोड़ा. उन्होंने आजादी को जन आंदोलन में बदल दिया. यह बड़ा बदलाव था. मैं समझता हूं देश के लिए मिटने वालों की कमी नहीं थी. लेकिन वह आते थे, शहीद हो जाते थे, फिर कोई आता था. लेकिन गांधी ने एक साथ पूरे देश में लोगों को खड़ा कर दिया. इस वजह से आजादी मिली. विकास भी जन आंदोलन बन जाना चाहिए. अगर कोई सोचता है कि सरकार विकास कर देगी. लोग सोचते हैं सरकार विकास कर देगी. लोग हर विकास के लिए सरकार पर निर्भर हैं. इस वजह से सरकार और आम लोगों में दूरी बढ़ गई. लोकतंत्र कोई कान्ट्रैक्ट एग्रीमेंट नहीं है कि पांच साल तुमको दिया तुम काम करो. यह भागीदारी का काम है. हमें भागीदारी लोकतंत्र पर बल देना चाहिए. हर काम करना सरकार का काम नहीं. जनता की ताकत बहुत होती है. सरकार बनने के बाद मैंने शौचालय बनाने का काम शुरू किया. सरकार इसे पूरा नहीं कर पाती लेकिन जनता ने शौचालय बनाने का काम उठा लिया और काम पूरा हो गया है. अब तक 40 लाख सीनियर सिटीजन ने अपने मन से सब्सिडी नहीं लेंगे ऐसा लिखकर दिया. अगर मैं कानूनन करता तो जुलूस निकलता. लोग विरोध करते. लेकिन 40 लाख लोगों ने खुद ब खुद सब्सिडी छोड़ी. चाहे बात गैस सब्सिडी की हो या एसी सब्सिडी छोड़ने की, लोगों ने खुद ब खुद छोड़ी. देस में सवा करोड़ परिवारों ने गैस सब्सिडी छोड़ी. देश में इमानदार लोगों की कमी नहीं है. मेरी कोशिश है कि हमने सरकार के नाम का अहंकार छोड़ देना चाहिए. जनता को साथ लेकर चलें तो हमें बेहतर परिणाम मिलेगा.

मयूरेश- आपने भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक करने का अति महत्वपूर्ण निर्णय लिया था. उस समय आपको कैसे अनुभव हुआ था?

जवाब- मैं आपका आभारी हूं. आप बोल नहीं सकते हैं लेकिन आपने सवाल पूछा. यह दिल को छूने वाला है. मैं आपको प्रणाम करता हूं. देखिए सर्जिकल स्ट्राइक भारत का हजारों वर्ष का इतिहास है. किसी भी युग में भारत ने किसी की भी जमीन हड़पने का प्रयास नहीं किया. बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि प्रथम व दूसरे विश्व युद्ध में हमें किसी की जमीन नहीं लेनी थी लेकिन हमें अपने लिए लड़ना था, लेकिन हमारे डेढ़ लाख सिपाहियों की शहादत मोल ली थी. आज भी यूएन का जो पीस किपिंग फोर्स है, उसमें सबसे बड़े भागीदारों में भारत भी शामिल हैं. भारत का चरित्र अजेय रहने का है, विजयी रहने का है लेकिन किसी के हक को छीनना भारत का चरित्र नहीं है. लेकिन यह तो भगवान राम और लक्ष्मण का संवाद है उसमें इस सिद्धांत को देखा जाता है. लेकिन जब कोई आतंकवाद एक्सपोर्ट करने का उद्योग बनाकर बैठा हो. जब किसी को युद्ध लड़ने की ताकत नहीं है, पीठ पर वार करने का प्रयास होता हो तो यह मोदी है उसी भाषा में जवाब देना जानता है. हमारे जवानों को टेंट, में सोए जवानों को मारा गया. आपमें से कोई चाहेगा मैं चुप रहूं. क्या उनको ईंट का जवाब देना चाहिए था या नहीं. इसलिए स्ट्राइक किया. इसलिए सेना पर गर्व है. जो योजना बनी थी, सेना ने उसे अच्छे से इंप्लीमेंट किया. मैंने अपने अफसरों को कहा कि आप फोन करके बता दो कि हमनें आज रात में ऐसा किया. हम सुबह ग्यारह बजे से फोन लगा रहे थे लेकिन वह फोन उठा नहीं रहे थे. हमनें पाकिस्तान को खुद बताया. 12 बजे उनसे बात हुई. उसके बाद हमने मीडिया को स्ट्राइक के बारे में सभी को बताया. यह स्ट्राइक भारत के वीरों का पराक्रम था. सभी को पता होना चाहिए कि अब हिंदुस्तान बदल चुका है. मैं इस मंच का उपयोग राजनीतिक प्रतिद्वदियों की आलोचना के लिए नहीं करना चहता. ईश्वर सभी को सदबुद्धी दे.

बच्ची के साथ बलात्कार दर्दनाक घटना है. क्या हम यह कहेंगे कि तुम्हारे समय में इतने होते थे और मेरे समय में इतने हुए. बलात्कार बलात्कार होता है. मैंने लालकिले से भी कहा था कि सिर्फ बेटी पर निगरानी रखना ही सही नहीं, बेटों पर भी निगरानी होनी चाहिए. रेप की ऐसी घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं. मुझे किताब पढ़कर के गरीबी सीखनी नहीं पड़ रही है. मुझे टीवी पर गरीबी को एहसास नहीं करना है. मैंनें वह जिंदगी झेली है. इसलिए मैं मन से मानता हूं कि इनकी जिंदगी में कुछ तो बदलाव लाऊं मैं. मैंने कहा हम 18 हजार गांव जहां बिजली नहीं पहुंची है. मैंने एक हजार दिन में पूरा करने की घोषणा कर दी थी. विभाग ने कहा था कि इन गांवों में बिजली पहुंचाने का 7 साल में पूरा होगा. मैंने कहा मेरे पास इतना समय नहीं है. गरीब महिलाएं शौचालाय जाने के लिए सूरज उगने से पहले जंगल जाती थीं. हमने शौचालय बनाने का काम शुरू किया. क्या हम शौचालय नहीं बना सकते. यह सवाल हमें सोने नहीं देते. आज तीन लाख गांव में शौचालय हैं. और काम तेजी से चल रहा है. अब मैंने बिड़ा उठाया है कि गांव के बाद अब घर में बिजली पहुंचाऊंगा. चार करोड़ परिवारों में आज भी बिजली नहीं है. मैं इन्हें सौभाग्य योजना के तहत मुफ्त में बिजली का कनेक्शन दूंगा.

सवा सौ करोड़ देशवासियों ने मुझे यहां क्यों बिठाया है? न मेरी जाति है न मेरा वंशवाद है. मेरे पास पूंजी एक ही है वह है कड़ी मेहनत, मेरे पास पूंजी है प्रमाणिकता, मेरे पास पूंजी है सवा सौ करोड़ देशवासियों का प्यार. मैं सभी को कहना चाहूंगा कि मैं भी आपके जैसा ही समान्य नागरिक हूं. मुझमें वो सारी कमियां है जो एक समान्य मानव में होती हैं. कृपा करके मुझे अलग न समझो. यह हकीकत है. मैं किस जगह बैठा हूं वह व्यवस्था का हिस्सा है. मैं वही हूं जो आप हैं. मैं आपसे अलग नहीं हूं. मेरे भीतर एक छात्र है. मैंने उसे कभी मरने नहीं दिया. मुझे जो दायित्व मिलता है उसे सीखने औऱ समझने की कोशिश करता हूं. चुनाव लड़ते समय कहा था कि मेरे पास तजुर्बा नही हैं. मैं गलतियां कर सकता हूं लेकिन मैं बदइरादे से गलतियां नहीं करूंगा. मैनें बीते चार साल में कोई काम गलत इरादे से नहीं किया. अब सवाल यह है कि मैंने कभी यह सोचा है कि देश मैं बदल दूंगा. मेरे भीतर यह विश्वास है कि मेरे देश में लाखों समस्याएं हैं तो सवा सौ करोड़ समाधान भी हैं. मिलियन प्रॉब्लम है तो बिलियन सॉल्यूशन भी हैं. कोई कल्पना कर सकता है नोटबंदी की. मुझे अर्जेंटीना के राष्ट्रपति‍ ने कहा कि जब आपने ऐसा किया तो मुझे लगा मेरा दोस्त गया. 86 फीसदी करेंसी एकाएक कारोबारी व्यवस्था से बाहर कर दी थी हमने. लेकिन यह देशवासियों के प्रति मेरा भरोसा था कि मेरा देश ईमानदारी के लिए जूझ रहा है. मेरा समान्य नागरिक ईमानदारी के लिए कष्ट झेलने को तैयार है. आज उसी का नतीजा है कि आप जितने भी परिणाम देखते हैं वह देशवासियों को शुक्रिया.

जो लोग मुझपर पत्थर फेंकते हैं मैं उन्ही पत्थरों से पथ बना लेता हूं और उसी पर चढ़कर आगे बढ़ता हूं. मेरा कॉन्सेप्ट रहा है टीम इंडिया.

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सैमुअल - मोदी केयर की बात की जा रही है. क्या यह एक हेल्थ सेक्टर में बड़ा बदलाव साबित होगा?

जवाब- मैं कोई बड़ी बातें नहीं करता हूं. लेकिन तीन चीजें बच्चों को पढ़ाई, युवा को कमाई, बुजर्गों को दवाई. ये चीजें हैं जो हमें एक स्वस्थ समाज के लिए चिंता करनी चाहिए. मैंने अनुभव किया परिवार अच्छा हो लेकिन परिवार में अगर एक बीमारी आ जाए. कोई बीमार हो जाए तो पूरा परिवार फंसा रह जाता है औऱ परिवार तबाह हो जाता है. एक व्यक्ति बीमार नहीं होता पूरा परिवार बीमार हो जाता है. हमारी योजना है आयुष्मान भारत, जिसे लोग मोदी केयर कह रहे हैं, इसमें हम देश में डेढ़ लाख से ज्यादा वेलनेस सेंटर बनाना चाहते हैं. जहां हेल्थ की सारी सुविधाएं हों औऱ वहां टेक्नोलॉजी से काम होता हो. दूसरा प्रीवेंटिव हेल्थ को बढ़ावा मिले चाहे यह योगा के नाम पर हो या किसी और रूप में. हमनें उन बच्चों के स्वास्थ की चिंता करते हुए मैर्टिनिटी लीव को 26 वीक कर दिया है. एक औऱ पहलू है कि एक परिवार को ऐसी व्यवस्था दी जाए जिसके तहत एक परिवार को साल भर में पांच लाख रुपये तक के बीमारी का खर्चा का भुगतान सरकार करेगी. इसके कारण गरीब की जिंदगी में जो संकट आता है उससे मुक्ती मिलेगी. दूसरा इस योजना से प्राइवेट अस्पताल का अच्छा नेटवर्क बनेगा. यह सभी के लिए फायदेमंद होगा.


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