डीजल वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध के सवाल पर राजनीतिक दल एकमत नहीं

डीजल वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध के सवाल पर राजनीतिक दल एकमत नहीं

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली:

दिल्ली में 2000 सीसी से ऊपर की नई डीजल गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन रोकने के फैसले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या डीजल की गाड़ियों पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया जाना चाहिए? राजनीतिक दल इस अहम सवाल पर बंटे हुए हैं।

विकल्प के लिए सरकार की पहल
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि वे इथेनॉल और पेट्रोल से चल सकने वाली गाड़ियों को लेकर एक नई नीति बनाने में लगे हैं। सरकार 26 जनवरी से पहले एक फ्लैक्सी फ्यूल पॉलिसी लाने की तैयारी कर रही है जिससे प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। गाड़ियों से बढ़ते प्रदूषण के मसले पर यह सरकार की ताजा पहल है।

मुद्दे पर सांसदों की राय अलग-अलग
उधर 31 मार्च तक दिल्ली में डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस अहम सवाल पर संसद में बहस छिड़ गई है। डीजल गाड़ियों से हो रही समस्या से निपटने के सवाल पर सांसदों की राय बंटी हुई है। जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने NDTV इंडिया से कहा, "प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध एक बार में ही लगा देना चाहिए। जैसे एक समय कोर्ट ने CNG गाड़ियों को लाने का फैसला किया था।"  जबकि उद्योगपति और सांसद राजीव चंद्रशेखर भी मानते हैं कि अब समय आ गया है कि डीजल की गाड़ियों का इस्तेमाल बंद किया जाए। हालांकि वे चाहते हैं कि डीजल गाड़ियों की संख्या धीरे-धीरे विभिन्न चरणों में घटाई जाए।

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सार्वजनिक परिवहन पर असर
कुछ सांसद मानते हैं कि डीजल गाड़ियों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के दौरान इस बात पर भी गंभीरता से विचार करना होगा कि इसका पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा। कांग्रेस महसचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं, "डीजल गाड़ियों को नियंत्रित करने से पहले यह आकलन करना होगा कि क्या पब्लिक ट्रांसपोर्ट को पेट्रोल से चलाया जा सकता है? इसका आर्थिक असर क्या होगा? क्या पब्लिक ट्रांसपोर्ट महंगा नहीं हो जाएगा?"

यानी सरकार को यह देखना होगा कि डीजल गाड़ियों पर पाबंदी के साथ-साथ पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुलभ भी हो और सस्ता भी हो। वरना यह पहल एक हद के बाद नाकाम हो जाएगी।