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राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार है या नहीं : सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित

सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रखा लिया है. इस मामले में 8 दिनों तक सुनवाई चली.

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राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार है या नहीं : सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित

राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी.

खास बातें

  1. राइट टू प्राइवेसी पर सुनवाई पूरी
  2. 9 जजों की संविधान पीठ ने की सुनवाई
  3. राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार है या नहीं, फैसला जल्द
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत ने राइट टू प्राइवेसी पर सुनवाई पूरी कर ली है. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ में सुनवाई हुई है. सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रखा लिया है. इस मामले में 8 दिनों तक सुनवाई चली. बता दें कि इस मामले की सुनवाई में UIDAI ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्राइवेसी एक कीमती अधिकार है. इसे आधार एक्ट में भी सरंक्षण दिया गया है. आधार के जरिए नागरिक को ट्रेक नहीं किया जा सकता. यहां तक कि अगर कोर्ट अनुमति दे तो भी सरकार इसे सर्विलांस के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान एएसजी तुषार मेहता ने कहा था कि कोर्ट का काम कानून बनाना नहीं बल्कि कानून की व्याख्या करना है. चाहे कोर्ट राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार बताए या नहीं लेकिन आनलाइन के दौर में कुछ भी प्राइवेट नहीं रहा है.

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है? बेंच में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने सुनवाई के दौरान कहा था कि विचार करने की बात यह है कि मेरे टेलीफोन या ईमेल को सर्विस प्रोवाइडरों के साथ शेयर क्यों किया जाए? मेरे टेलीफोन पर कॉल आती हैं तो विज्ञापन भी आते हैं. तो मेरा मोबाइल नंबर सर्विस प्रोवाइडरों से क्यों शेयर किया जाना चाहिए? क्या केंद्र सरकार के पास डेटा प्रोटेक्ट करने के लिए ठोस सिस्टम है? सरकार के पास डेटा को संरक्षित करने लिए ठोस मैकेनिज्म होना चाहिए. हम जानते हैं कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार डेटा इकट्ठा कर रही है लेकिन यह भी सुनिश्चित हो कि डेटा सुरक्षित रहे.

यह भी पढ़ें : संविधान पीठ का सरकार से सवाल- क्या आधार डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है?

एएसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया था कि ये डेटा पूरी तरह प्रोटेक्टेड है और अगली सुनवाई में वे बताएंगे.  गैर बीजेपी राज्यों के सुप्रीम कोर्ट आने के बाद महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची है और उसने केंद्र सरकार का समर्थन किया है. राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि प्राइवेसी एक मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि एक धारणा है. प्राइवेसी की व्याख्या नहीं की जा सकती. यह कोई अलग से अधिकार नहीं है.

सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता कह रहे हैं कि 40 साल से सुप्रीम कोर्ट मान रहा है कि प्राइवेसी मौलिक अधिकार है. लेकिन उस 1975 के जजमेंट में कहा गया कि अगर मान लिया जाए कि प्राइवेसी मौलिक अधिकार है. यानि याचिकाकर्ताओं की ये दलील गलत है कि सुप्रीम कोर्ट मानता रहा है कि प्राइवेसी मौलिक अधिकार है.

VIDEO : राइट टू प्राइवेसी पर रिपोर्ट

तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि डेटा प्रोटेक्शन के लिए कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में दस लोगों की कमेटी का गठन किया है.
 


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