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रूस से नायाब रक्षा कवच का समझौता अंतिम चरण में, रक्षा मंत्री ने अमेरिकी आपत्तियों को किया दरकिनार

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कश्मीर में युवाओं का आतंकवाद का रास्ता अपनान में चेतावनी जैसा कुछ नहीं, इसको मैनेज किया जा सकता है

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रूस से नायाब रक्षा कवच का समझौता अंतिम चरण में, रक्षा मंत्री ने अमेरिकी आपत्तियों को किया दरकिनार

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण.

खास बातें

  1. रक्षा मंत्री ने कहा- महबूबा मुफ्ती का बयान पूरी तरह से बेबुनियाद
  2. हम गठबंधन से ज़रूर हट गए हैं लेकिन पीडीपी को तोड़ने की बात ग़लत
  3. यदि सेना मानवाधिकारों का हनन कर रही होती तो युवा सेना में भर्ती नहीं होते
नई दिल्ली: रूस से खरीदे जाने वाले एस-400 लंबी दूरी के सुपरसोनिक एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम का समझौता अंतिम चरण पर है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि समझौता होने के ढाई से चार साल के बीच देश में यह सिस्टम सेना के पास होगा.

गौरतलब है कि उन्नत किस्म के इस एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम के आने पर भारत की उत्तरी, उत्तर पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी सीमा लगभग पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी. पाकिस्तान और चीन से होने वाले किसी भी हमले के हालत में यह भारत के सुरक्षा के लिए कारगर साबित होगा.

निर्मला सीतारमण ने रूस से होने वाले इस समझौते पर अमेरिका की आपत्तियों को भी सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं है और वहां उठाई जा रही आपत्तियां तकनीकी तौर पर सही नहीं है. उन्होंने कहा कि एस-400 पर रूस से हमारी बातचीत लंबे समय से चल रही है.

सीतारमण ने कहा कि अमेरिका के सैन्य हितों की रक्षा के लिए बना प्रतिबंध कानून कैटसा (काउंटरिंग अमेरिकन एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट) अमेरिकी क़ानून है और इसका भारत और रूस के बीच होने वाले समझौते से कोई संबंध नहीं है. वैसे अमेरिकी प्रशासन के कुछ हलकों में कयास लगाए जा रहे थे कि कैटसा के सख्ती से लागू होने से भारत पर इसकी आंच पड़ेगी और जो देश कैटसा कानून को नजरअंदाज करेंगे अमेरिका उन पर प्रतिबंध लगा सकता है.

आपको बता दें कि एस-400 चार सौ किलोमीटर के क्षेत्र में आने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोनों या छुपे हुए विमानों पर हमला कर उन्हें गिरा देगा. इसकी मदद से आसानी से पकड़ में न आने वाले लड़ाकू विमान भी गिराए जा सकेंगे. एस-400 के लॉंचर से दुश्मन के विमान या मिसाइल पर तीन सेंकड में दो मिसाइलें छोड़ी जा सकती हैं. इसके द्वारा छोड़ी गई मिसाइलो की रफ्तार 5 किलोमीटर प्रति सेंकड की रफ्तार से छूटती हैं और 35 किलोमीटर की ऊंचाई तक वार कर सकती हैं. दोनों देशों के बीच बनी शुरुआती समझ के मुताबिक भारत इस तरह के 6000 मिसाइल सिस्टम रूस से खरीद सकता है.

कश्मीर में युवाओं के आतंकवाद से जुड़ने के सवाल पर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि स्थिति चिंताजनक नहीं है और इस स्थिति से निपटा जा सकता है. उन्होंने कहा कि कश्मीर के युवाओं को कौन बहका रहा है, उनके पीछे कौन है, हम इस पर काम कर रहे हैं.

सीतारमण ने कहा कि महबूबा मुफ्ती ने जो बयान दिया है वह पूरी तरह से बेबुनियाद है. उनकी पार्टी को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, इससे हमारा कोई लेना देना नहीं है. उन्होंने कहा कि पीडीपी को तोड़ने वाली बात बेबुनियाद है. हम गठबंधन से ज़रूर हट गए हैं लेकिन पीडीपी को तोड़ने की बात ग़लत है.

यह भी पढ़ें : निर्मला सीतारमण का कांग्रेस पर हमला, बोलीं- 2019 का चुनाव धर्म के आधार पर लड़ना चाहती है

कश्मीर में युवाओं के आतंकवाद का रास्ता अपनाने के सवाल पर निर्मला सीतारमण ने कहा कि कश्मीर में युवाओं का आतंकवाद का रास्ता अपनाना चेतावनी नहीं है और इसको मैनेज किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि हम इस पर ध्यान दे रहे हैं कि युवाओं को ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिल रही है. सीमापार से आने वाले आतंकवादियों को वहीं ख़त्म करने पर ज़ोर दिया जा रहा है.

यह पूछे जाने पर कि कश्मीर में राज्यपाल शासन लगने के बाद से उन्होंने सुरक्षा बलों को क्या निर्देश दिए हैं, रक्षा मंत्री ने कहा कि राज्यपाल शासन के बाद से उन्होंने सुरक्षा बलों को कुछ नया नहीं बताया है. सेना को जो करना है उसका राज्यपाल शासन लगने से कोई संबंध नहीं है.

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कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन पर संयुक्त राष्ट्र  की भारत विरोधी रिपोर्ट के बाद अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव की तल्ख़ टिप्पणी पर निर्मला सीतारमण ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट में कुछ अलग कहे जाने की कोई आशा भी नहीं थी. उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट कहीं और बैठकर बनाई गई है. सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों से निपटने में आला दर्जे की सहनशीलता दर्शाते हैं. इतना ही नहीं सेना वहां बीमार लोगों की मदद, बच्चों की स्कूलिंग समेत तमाम सामाजिक गतिविधियां भी चलाती है. उन्होंने कहा कि यदि सेना मानवाधिकारों का हनन कर रही होती तो औरंगजेब के परिवारे वालों के अलावा इतने सारे और युवा सेना में भर्ती होने के लिए आगे नहीं आते.


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