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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध : केस 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया

कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ ये तय करेगी कि क्या महिला के बॉयोलाजिकल फैक्टर के आधार पर मंदिर में प्रवेश पर रोक समानता के अधिकारों का उल्लंघन करता है?

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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध : केस 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला

खास बातें

  1. 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध
  2. मामला तीन जजों की बेंच को भेजा गया
  3. क्या धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करता है
नई दिल्ली: केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का मामला पांच जजों की संविधान पीठ को भेजा गया. तीन जजों की बैंच ने संविधान पीठ को मामला भेजा है. कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ ये तय करेगी कि क्या महिला के बॉयोलाजिकल फैक्टर के आधार पर मंदिर में प्रवेश पर रोक समानता के अधिकारों का उल्लंघन करता है?  क्या महिलाओं पर रोक के लिए धार्मिक संस्था में चल रही इस प्रथा को इजाजत दी जा सकती है? क्या सबरीमाला धार्मिक संस्था की यह रोक संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में है? क्या अयप्पा मंदिर अलग धार्मिक संस्था है और अगर है तो क्या वह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का हनन कर सकता है और ऐसे महिलाओं को रोका जा सकता है? क्या महिलाओं पर रोक केरला हिंदू पब्लिक वरशिप एंट्री एक्ट का हनन है? 

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सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को तय करना था कि केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से संबंधित मामले को संवैधानिक पीठ के समक्ष भेजा जाए या नहीं. 

सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 20 फ़रवरी को इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 3 जजों की पीठ ने अमीकस क्युरी सहित संबंधित पक्षों से संवैधानिक पीठ से पूछे जाने वाले सवालों की सूची तैयार करने को कहा था.

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पिछले साल 7 नवंबर को केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी थी कि यह सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में है. शुरुआत में राज्य की एलडीएफ सरकार ने 2007 में महिलाओं के प्रवेश पर प्रगतिशील रुख बनाए रखा था, जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने इस फैसले को रद्द कर दिया था.
यूडीएफ का कहना था कि वह 10-50 साल की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के खिलाफ हैं, क्योंकि इस परंपरा का प्राचीन समय से पालन किया जा रहा है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने 11 जुलाई, 2016 को संकेत दिए थे कि यह इस मामले को 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ को भेज सकता है, क्योंकि यह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला है. कोर्ट का कहना था कि महिलाओं को भी संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं और अगर इसे संवैधानिक बेंच को भेजना पड़ा तो वह इस पर डीटेल आदेश देंगे.


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