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जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 खत्म करने के खिलाफ याचिकाओं को बड़ी बेंच को भेजने के मामले में फैसला सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी कर ली, फैसला सुरक्षित रख लिया, केंद्र सरकार ने 370 के प्रावधान हटाने को सही ठहराया

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जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 खत्म करने के खिलाफ याचिकाओं को बड़ी बेंच को भेजने के मामले में फैसला सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने के खिलाफ दायर याचिकाओं को बड़ी बेंच को भेजने के मामले में सुनवाई पूरी कर ली है.

खास बातें

  1. कोर्ट तय करेगा कि मामला सात जजों की पीठ को भेजा जाए या नहीं
  2. केंद्र सरकार ने मामला सात जजों की पीठ में भेजने का विरोध किया
  3. वकील राजीव धवन और सॉलिसिटर जनरल के बीच गर्मा-गरम बहस हुई
नई दिल्ली:

जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में संसद द्वारा अनुच्छेद 370 (Article 370) के प्रावधानों को खत्म करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि मामले को सात जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं. सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को मामले की सुनवाई पूरी कर ली. केंद्र सरकार ने 370 के प्रावधान हटाने को सही ठहराया और मामले को सात जजों की पीठ में भेजे जाने का विरोध किया.

एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता वास्तव में अस्थायी थी. भारत राज्यों का संघ हैं. भारत के संविधान के अनुच्छेद- एक के तहत जम्मू-कश्मीर पहले ही भारत के संविधान का एक हिस्सा बन गया था. आर्टिकल 370 तो केवल जम्मू-कश्मीर राज्य की विधायी शक्तियों को ही सामने लाता है. भारतीय राज्यों के एकीकरण की इस कहानी का उद्देश्य देश की समग्रता को दिखाना है. राज्य का इतिहास कई मायने रखता है. भारत संघ में जम्मू-कश्मीर का प्रवेश "अपरिवर्तनीय" है. महाराजा ने राज्य में मौजूद विद्रोहियों के कारण भारत से सहायता मांगी थी. वहां आपराधिक गतिविधियां हो रही थीं और रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान द्वारा प्रशिक्षित अलगाववादियों को विशेष रूप से कहर ढाने के लिए भेजा गया था.

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केके वेणुगोपाल ने पाकिस्तान और महाराजा के बीच की कलह को उजागर करने के लिए वीपी मेनन की पुस्तक ‘इंटीग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट्स' (1956) का एक अंश पढ़ा. जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 के मामलों में सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ के सामने एटॉर्नी जनरल ने इतिहास का जिक्र करते हुए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा और वहां राज्य के विशिष्ट संविधान की बात बताई. एटॉर्नी जनरल ने कहा कि वहां के राजा हरि सिंह ने रियासत के भारत में मिलने पर हामी भरी. जून 1949 में विलय के बाद और नवम्बर 1950 में युवराज कर्ण सिंह को चुनाव के जरिए भावी सदर-ए-रियासत घोषित किया गया. अब प्रेमनाथ कौल के मुकदमे में सवाल ये उठा कि क्या राजा को कानून बनाने का अधिकार है, या नहीं? तो क्या संसद के कानून बनाने के अधिकार का अतिक्रमण कोई राजा कर सकता है? इस पर सुप्रीम कोर्ट का प्रेमनाथ कौल मामले का फैसला और उसके बाद आए फैसलों में कोई बदलाव या विरोधाभास नहीं है.

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एजी वेणुगोपाल ने कहा कि अनुच्छेद 370 (1) और (3) के तहत संसद के इस अधिकार को चुनौती नहीं दी गई थी. वो सिर्फ महाराजा के कानून बनाने के अधिकार और रियासत के लिए किए गए निर्णय को लेकर था. तब ये समझौता हुआ था कि संविधान सभा के गठन से पहले अगर केंद्र सरकार किसी समवर्ती सूची वाले विषय पर कोई समझौता होगा तो वो संविधान सभा के सामने रखा जाएगा. महाराजा को राज्य के संवैधानिक प्रधान/सदर-ए-रियासत की मान्यता होगी. महाराजा के अधिकार और शक्तियां सीमित होंगी. लेकिन उस वक्त युवराज को कानून बनाने के लिए सक्षम माना गया था. केके वेणगोपाल ने कहा कि प्रेमनाथ कौल का वो मुकदमा राजा के भूमि सुधार कानून बनाने और लागू करने के अधिकारों पर हमला था.सम्पत प्रकाश केस में भी संसद के कानून बनाने के अधिकारों को लेकर कोई दखल नहीं दिया गया.

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याचिकाकर्ताओं की ओर से राजीव धवन ने संविधान पीठ के समक्ष दलीलें दीं और मामले को सात जजों को भेजे जाने का विरोध किया. धवन ने कहा, मौजूदा हालात अनोखे हालात हैं जो कभी पैदा नहीं हुए. उन्होंने कहा कि सात जजों की पीठ को संदर्भ का सवाल ही नहीं उठता है. पहली बार भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 का उपयोग करके एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया. यदि वह एक राज्य के लिए ऐसा करते हैं, तो वे किसी भी राज्य के लिए ऐसा कर सकते हैं. केंद्र ने जानबूझकर इसके लिए राष्ट्रपति शासन लगाया. अनुच्छेद 370 के संदर्भ में संशोधन के लिए राज्य को विस्तृत अधिकार देने चाहिए थे. हालांकि, सवाल यह है कि आखिर किस कीमत पर, प्रभावी रूप से, केवल जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 147 के अनुसार ही कोई संशोधन किया जा सकता है.

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दरअसल कुछ याचिकाकर्ता चाहते थे कि मामला सात जजों की बेंच को भेजा जाए. वरिष्ठ वकील राजीव धवन और जम्मू-कश्मीर की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच गर्मा-गरम बहस भी हुई. तुषार मेहता ने कहा कश्मीर में अलगाववाद के पक्ष में कोई तर्क या गलत तस्वीर देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. मैं दिखाऊंगा कि असली अलगाववादी कौन हैं. धवन ने आपत्ति जताई और कहा, राजनीतिक बयान नहीं दिए जाने चाहिए. इस अदालत के समक्ष मुद्दा यह नहीं है कि क्या जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है. मुद्दा इस बात पर है कि जम्मू और कश्मीर भारत के किस हिस्से में है. राजीव धवन ने कहा एजी ने एक ऐतिहासिक यात्रा कराई है जो वास्तव में अप्रासंगिक है.

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धवन ने कहा कोर्ट की प्रैक्टिस है कि एजी को किसी भी चीज और हर चीज पर सुना जाता है, लेकिन यह एक अलग चीज है. जब धवन ने कश्मीर के नक्शे दिखाए तो तुषार ने इस पर आपत्ति जताई. धवन ने कहा कि अगर नेहरू की आलोचना करने के लिए एजी माउंटबेटन पर भरोसा कर सकते हैं, तो मैं इस नक्शे को दिखा सकता हूं.

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