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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मानसिक उम्र POCSO के तहत ट्रायल का आधार नहीं हो सकती

दरअसल सुप्रीम कोर्ट को तय करना था कि क्या दुष्कर्म पीडि़तों की मानसिक उम्र आरोपियों पर बाल यौन अपराध संरक्षण (पोक्‍सो) कानून में मुकदमा चलाने का आधार हो सकती है?

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मानसिक उम्र POCSO के तहत ट्रायल का आधार नहीं हो सकती

सु्प्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा है कि मानसिक उम्र के आधार पर नहीं बल्कि बाइलोजिकल उम्र के हिसाब से केस चलना चाहिए. दरअसल सुप्रीम कोर्ट को तय करना था कि क्या दुष्कर्म पीडि़तों की मानसिक उम्र आरोपियों पर बाल यौन अपराध संरक्षण (पोक्‍सो) कानून में मुकदमा चलाने का आधार हो सकती है? पिछले साल कोर्ट ने कानून के इस अहम सवाल पर बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर कोई शारीरिक रूप से बालिग हो, लेकिन मानसिक रूप से नहीं तो क्यों न उसे नाबालिग माना जाए?
 
इस मामले में बेटी की गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची मां की ओर से पेश ऐश्‍वर्या भाटी ने पीडि़ता की मानसिक आयु छह साल के आधार पर पोस्‍को कानून में स्पेशल कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने की मांग करते हुए कहा कि पीडि़ता जन्म से ही मानसिक पक्षाघात (सेरेबल पाल्सी) से पीडि़त है. उसकी वास्तविक उम्र जरूर 38 साल की हो गई है, लेकिन उसका दिमाग विकसित नहीं हुआ है. कानून में दी गई परिभाषा को व्यापक अर्थ में देखा जाए और उसमें मानसिक उम्र को भी शामिल किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि पोक्सो सिर्फ दंडात्मक कानून नहीं है ये संरक्षण, निवारण और सुधारवादी कानून भी है.

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अब यौन उत्पीड़न की शिकार मंदबुद्धि महिलाओं से दुराचार करने वालों पर न सिर्फ पोक्सो जैसे सख्त कानून में मुकदमा चलेगा बल्कि सुनवाई और ट्रायल के दौरान पीडि़तो के साथ भी बच्चे जैसा व्यवहार किया जाएगा जैसा कि पोक्सो कानून में कहा गया है. बहस के दौरान अभियुक्तों ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे. इसका असर संविदा कानून और संपत्ति हस्तांतरण कानून पर भी पड़ेगा. वकील ने कहा कि कानून की निगाह में पीडि़ता बालिग है. इस पर बेंच ने कहा कि वे यहां संविदा या संपत्ति कानून पर विचार नहीं कर रहे हैं. ये यौन उत्पीड़न का मामला है और ये गंभीर अपराध है. इससे बच्चों को संरक्षण मिलना ही चाहिए. यही पोक्सो कानून का उद्देश्य है.
 
कोर्ट ने कहा कि वे कानून की परिभाषा में दखल नहीं दे रहे हैं. बच्चों को संरक्षण देने के लिए सिर्फ उसका दायरा बढ़ा रहे हैं ताकि कानून का उद्देश्य पूरा हो. सिर्फ शारीरिक आधार पर ही तय होता है कि कोई वयस्क हो गया है क्यों न मानसिक आधार पर भी इसे देखा जाए. पोक्सो कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों के संरक्षण के लिए बना है. कोर्ट ने कहा था कि संसद ने कानून बना दिया है कि 18 वर्ष से कम उम्र को नाबालिग माना जाएगा, लेकिन यह कोर्ट तय करेगा कि यह शारीरिक के साथ-साथ मानसिक होगा या नहीं.

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