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नहीं पहुंच पा रहा है कुमाऊं के सीमावर्ती गांवों में सरकारी अनाज, नेपाल से खरीदते हैं 'चीन का राशन'

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सीमावर्ती गांवों के आदिवासियों को राशन का पूरा कोटा नहीं मिल पाने के कारण उन्हें नेपाली बाजार से मिलने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है.

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नहीं पहुंच पा रहा है कुमाऊं के सीमावर्ती गांवों में सरकारी अनाज, नेपाल से खरीदते हैं 'चीन का राशन'

प्रतीकात्मक चित्र

खास बातें

  1. कुमाऊं क्षेत्र में सीमावर्ती गांवों तक सरकारी राशन नहीं पहुंच पा रहा है.
  2. लोग नेपाल के बाजार से राशन खरीद रहे हैं.
  3. गांवों के लोग चीन के अनाज पर निर्भर हैं.
नई दिल्ली:

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सीमावर्ती गांवों के आदिवासियों को राशन का पूरा कोटा नहीं मिल पाने के कारण उन्हें नेपाली बाजार से मिलने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है. क्षेत्र में राशन की आपूर्ति बढ़ाने की मांग को लेकर आज यहां धारचूला के उपजिलाधिकारी आर के पांडे से मिलने आये व्यास घाटी के प्रतिनिधिमंडल के एक आदिवासी नेता कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा दिये जा रहे राशन का कोटा उनकी जरूरत से कम पड़ रहा है जिसके कारण ग्रामीणों को नेपाली बाजार में बिकने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है.

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उन्होंने कहा कि ग्रामीण गर्बियांग के पास भारत और नेपाल को जोड़ने वाले काली नदी पर बने पुल को पार करते हैं और अपनी जरूरत को पूरा करने के लिये पड़ोसी देश के टिंकर और चांगरू गांवों के बाजार से राशन खरीदते हैं.  गर्बयाल ने बताया कि सरकार हर परिवार को प्रति माह पांच किलो गेहूं और दो किलो चावल देती है जो बहुत कम है और इससे भी बड़ी बात यह है कि उन्हें पिछली बार राशन मानसून शुरू होने से पहले मिला था.


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हालांकि, इस संबंध में पांडे ने कहा कि मानसून शुरू होने से पहले हेलीकॉप्टर द्वारा व्यास घाटी के ग्रामीणों के लिये राशन भेजा गया था जबकि ऊंचाई पर बसे गांवों के लिये अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर का राशन अभी भेजा जायेगा. उन्होंने कहा कि सड़क मार्ग की मरम्मत जारी रहने के कारण प्रशासन को व्यास घाटी तक राशन पहुंचाने के लिये हेलीकॉप्टर की उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिये प्रशासन सेना के संपर्क में भी है, ताकि उनके हेलीकॉप्टरों का प्रयोग किया जा सके. 


(इनपुट - भाषा)
 



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