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भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव : बताया कम, किया ज्यादा

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नई दिल्ली: भले ही केंद्र सरकार ज़मीन अधिग्रहण कानून में किए गए बदलावों को सामान्य बताते हुए नए अध्यादेश का बचाव कर रही हो, लेकिन इस अध्यादेश को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि सरकार ने जितने बदलावों की चर्चा प्रेस में की, असल में कानून में उससे कहीं अधिक बदलाव हुए हैं। कांग्रेस और टीएमसी के बाद शनिवार को बीएसपी और आम आदमी पार्टी ने भी इन बदलावों की आलोचना की और कहा कि सरकार उद्योगपतियों के दबाव में है।

अध्यादेश पर करीब से नज़र डालने पर पता चलता है कि सरकार ने पुराने ज़मीन अधिग्रहण के मामले में रेट्रोस्पेक्टिव क्लॉज़ में काफी बदलाव किए हैं। 2013 के कानून में यह व्यवस्था की गई थी कि अगर किसी ज़मीन के अधिग्रहण को कागज़ों पर 5 साल हो गए हैं और भौतिक रूप से सरकार के पास कब्जा नहीं है और मुआवज़ा नहीं दिया गया, तो मूल मालिक ज़मीन को वापस मांग सकता है।

सरकार ने अब इसमें यह प्रावधान जोड़ दिया है कि अगर मामला अदालत में चला गया है तो मुकदमेबाज़ी के वक्त को 5 साल की मियाद में नहीं जोड़ा जाएगा। इससे जमीन मालिकों की मुश्किल बढ़ेगी और आशंका है कि लोग फिर अदालत में जाएंगे।

साल 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को बनाने में अहम रोल अदा करने वाले वकील मोहम्मद अली ख़ान कहते हैं, 'अमूमन ज़मीन अधिग्रहण करने पर लोग तुरंत अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं और अधिकतर मामलों में स्टे आर्डर मिल भी जाता है। ऐसे में एनडीए सरकार का ये नया प्रावधान ज़्यादातर मामलो में भूमि मालिकों के लिए मुश्किल खड़ी करेगा।'

इतना ही नहीं सरकार ने रेट्रोस्पेक्टिव क्लॉज के तहत मुआवज़े की परिभाषा को बदला है। पुराने अधिग्रहणों में अगर मुआवज़ा प्रभावित व्यक्ति के खाते में नहीं भी गया है और सरकार ने अदालत में या किसी और निर्मित खाते में मुआवज़े का फंड जमा करा दिया है, तो उसे 'मुआवजा दिया गया' माना जा सकता है।

सरकार ने एक और अहम बदलाव किया है जिसके तहत ज़मीन लेने के बाद कंपनियों के ऊपर से उस ज़मीन पर पांच साल के भीतर उस पर काम शुरू करने की पाबंदी हटा ली गई है। पहले कानून में व्यवस्था थी कि पांच साल के भीतर काम शुरू न होने पर मूल मालिक ज़मीन पर दावा पेश कर सकते हैं। जानकार कह रहे हैं कि इस बदलाव से उन लोगों का अधिग्रहण में दखल बढ़ेगा जो किसी प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर नहीं हैं या जिनके पास कोई ठोस योजना नहीं है।

सरकार ने कानूनी की अनदेखी करने और कानून तोड़ने वाले अधिकारियों के खिलाफ कदम उठाने के लिए रखी गए प्रावधान भी ढीले किए हैं। नए बदलाव के मुताबिक किसी अफसर पर कार्रवाई के लिए अब संबंधित विभाग की अनुमति लेना ज़रूरी होगा।


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