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अंकुरजीत की कहानी, जिन्होंने बगैर आंखों की रोशनी के सिविल सर्विस परीक्षा में हासिल की 414वीं रैंक

स्टीफन हॉकिंग के कहा है कि " चाहे ज़िन्दगी कितनी भी कठिन लगे, आप हमेशा कुछ न कुछ कर सकते हैं और सफल हो सकते हैं".ऐसी ही एक कहानी अंकुरजीत की है.

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अंकुरजीत की कहानी, जिन्होंने बगैर आंखों की रोशनी के सिविल सर्विस परीक्षा में हासिल की 414वीं रैंक

अंकुरजीत ने इस बार की सिविल सेवा परीक्षा में 414वीं  रैंक हासिल की है.

नई दिल्ली:

स्टीफन हॉकिंग ने कहा था, 'चाहे ज़िन्दगी कितनी भी कठिन लगे, आप हमेशा कुछ न कुछ कर सकते हैं और सफल हो सकते हैं.' 

ऐसी ही एक कहानी अंकुरजीत की है जिन्होंने UPSC 2017  में 414  रैंक हासिल की है. अंकुरजीत देख नहीं सकते लेकिन उन्हें ये मुकाम केवल अपनी लगन, मेहनत और दृढ़ निश्‍चय से हासिल किया है. उन्होंने टेक्नोलॉजी की मदद से पढाई की और अपनी डिसेबिलिटी को एबिलिटी में बदला. ये बातें पढ़ने में जितनी सरल लग रही हैं असलियत में उतनी ही मुश्किल हैं. किसी ने कहा है कि 'जब किसी पर मुसीबत आती है, तब या तो वो बिखर जाता है या निखर जाता है.' अंकुरजीत उस मुसीबत में और निखर गए. 

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अंकुरजीत बचपन से ही पढ़ाई में काफी मेधावी थे, लेकिन उन्हें धीरे-धीरे कम दिखने लगा और पढ़ने में दिक्‍कत होने लगी. उन्‍हें ब्‍लैकबोर्ड भी नहीं दिखता थाऔर वो केवल सुनकर चीज़ो को समझने की कोशिश करने लगे. 


अंकुरजीत हरियाणा के यमुनानगर के पास एक छोटे से गांव रसूलपुर में पले-बढ़े हैं और उनकी 10वीं  तक की पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से ही हुई है. जब गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे खेलते और मस्ती करते थे तब अंकुरजीत मां के मदद से सारी किताबें पहले ही पढ़ लेते थे ताकि जब क्लास में टीचर पढ़ाएं तब वह सुनकर ही सब कुछ समझ लें. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे-वैसे उनके देखने की क्षमता कम होती चली गई लेकिन पढ़ाई का शौक और कुछ बड़ा करने की चाहत कम होती रौशनी के साथ दिन-ब-दिन और तीव्र होती चली गई. 
 

ankurjeet

दोस्तों, परिवार और खासतौर पर अपने शिक्षकों की बदौलत अंकुर वो हासिल कर पाए जो वो करना चाहते थे. NDTV से खास बातचीत में अंकुर ने बेहद रोमांचक किस्सा बताते हुए कहा कि जब वो 11वीं में थे तब उनके स्कूल में एक कोचिंग सेंटर वाले आए और बच्चो को इंजीनियरिंग में करियर बनाने की सलाह देने लगे. तब उन्‍हें ज़िन्दगी में पहली बार JEE के बारे में पता चला. साथ ही यह भी समझ आया कि ये बेहद मुश्किल परीक्षा है. वह चुपचाप सुनकर लौट आए. फिर उनकी टीचर ने उनसे पूछा कि क्या वो JEE का फॉर्म भरेंगे? लेकिन उन्‍होंने यह कहकर मना कर दिया कि वो परीक्षा में सफल नहीं हो पाएंगे और उनके पैसे बर्बाद हो जाएंगे. 
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इस बात पर अंकुरजीत की टीचर ने उन्‍हें पैसे दिए और कहा, 'तुम मेरे पैसे बर्बाद कर दो पर एग्जाम जरूर दो. कोशिश करना जरूरी है, भले ही उसका नतीजा कुछ भी आए.' ये बात अंकुरजीत के दिल को छू गयी और वह उस परीक्षा में न सिर्फ सफल हुए बल्कि उन्हें आईआईटी रुड़की  में एडमिशन मिल गया.  यहीं से उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. 
 


आईआईटी ने अंकुरजीत के सपनों को नई उड़ान दी और उन्हें टेक्नोलॉजी के करीब ला दिया जिससे उन्हें पढ़ने में होनी वाली दिक्कतों का हल मिल गया. वो स्क्रीन रीडर की मदद से किताबें पढ़ने लगे और जब किसी चीज़ को समझने में दिक्कत आती तब दोस्त उनको उसका हल बता देते. 

इस तरह अंकुजीत ने आईएएस अफसर बनने का जो सपना बचपन में देखा था अब वह अब पास दिखने लगा. अंकुरजीत के साथ उनके तीन और दोस्त भी यही सपना देख रहे थे. वो कहते हैं न कि 'जब आप किसी चीज़ को शिद्दत से चाहते हैं तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है.' उसी तरह इन चारों दोस्तों ने एक साथ UPSC तैयारी की तैयारी की और इस साल पास हो गए.
 

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अंकुरजीत ने अपने जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा क्‍यों‍कि वो मानते थे कि जीत और हार आपकी सोच पर निर्भर करती है. मान लो तो हार होगी और ठान लो तो जीत होगी. इसलिए उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों पर तरस नहीं दिखाया बल्कि उसको हर बार चुनौती दी जिसका नतीजा आज सबके सामने हैं.

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