सुप्रीम कोर्ट में आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाएं खारिज

राज्यसभा सांसद जयराम रमेश समेत सात याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर चेंबर में विचार हुआ, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने इस पर फिर असहमति जताई

सुप्रीम कोर्ट में आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट.

नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पांच जजों की बेंच ने आधार (Aadhaar) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने इस पर फिर असहमति जताई. मामले में चेंबर में विचार हुआ. राज्यसभा सांसद जयराम रमेश समेत सात याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर विचार हुआ. जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने विचार किया. 

कोर्ट ने कहा शीर्ष अदालत का बाद का फैसला पुनर्विचार का आधार नहीं हो सकता. पांच जजों में से न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ का कहना है कि पुनर्विचार के फैसला के लिए तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक कि कोई बड़ी पीठ लंबित धन विधेयक के मुद्दे पर फैसला नहीं दे देती. बहुमत से संविधान पीठ ने याचिका को निरस्त करते हुए कहा, हमारी राय में, 26.09.2018 के निर्णय और आदेश पर पुनर्विचार के लिए कोई मामला नहीं बनता है. हम उस बदलाव को कानून के समन्वय या बाद के निर्णय / समन्वयन या बड़े बेंच के निर्णय से जोड़ने की जल्दबाजी करते हैं, जिसे पुनर्विचार के लिए आधार नहीं माना जा सकता. 

लेकिन न्यायमूर्ति  चंद्रचूड़ ने बहुमत की राय से असहमति जताई और कहा ''इन याचिकाओं को खारिज करने के गंभीर परिणाम होंगे, न केवल न्यायिक अनुशासन के लिए, बल्कि न्याय के अंत के लिए भी. इस प्रकार, पुनर्विचार याचिकाओं के वर्तमान बैच को तब तक लंबित रखा जाना चाहिए जब तक कि बड़ी पीठ रोजर मैथ्यू में इसे संदर्भित प्रश्नों का निर्णय नहीं ले लेता. मैं यह निष्कर्ष निकालता हूं कि संवैधानिक सिद्धांतों और कानून के शासन की आवश्यकता होगी कि पुनर्विचार याचिकाओं पर निर्णय से बड़ी पीठ के संदर्भ का इंतजार करना चाहिए."

याचिकाओं में आधार को बहुमत के फैसले के रूप में बरकरार रखने की सरकार के "वैध उद्देश्य" को पूरा करने के लिए व्यक्तिगत निजता पर एक उचित प्रतिबंध के रूप में अदालत के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी. संविधान पीठ द्वारा रखे गए बहुमत के दृष्टिकोण में आधार को एक "अनूठा" पहचान प्रमाण घोषित किया था. जबकि अपनी असहमति में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने आधार को "असंवैधानिक" कहा. 

याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में एक खुली अदालत की सुनवाई और इस आधार पर मौखिक रूप से प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी थी कि संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे वर्तमान मामले में उत्पन्न हुए हैं. मामले में पुनर्विचार के लिए वरिष्ठ वकील श्याम दीवान द्वारा लिखित नोट में बताया गया कि एक फैसले में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 13 नवंबर 2019 को रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड के मामले में आधार पर फैसले की शुद्धता पर संदेह व्यक्त किया गया था.


अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 110 की व्याख्या से संबंधित मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया. उन्होंने 14 नवंबर, 2019 को पारित सबरीमला पुनर्विचार फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें पांच न्यायाधीशों की पीठ ने खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दी थी. और फिर संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या के संबंध में निर्धारित कानून के साथ असंगतता पाए जाने पर, अदालत ने इस मामले को कानून पर एक आधिकारिक घोषणा के लिए नौ न्यायाधीशों की एक बड़ी पीठ को संदर्भित किया था. उन्होंने 11 मई, 2020 को सबरीमाला मामले में एक बार फिर से नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के एक फैसले पर भरोसा किया है जहां शीर्ष अदालत ने संदर्भ की स्थिरता को देखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास कानून की स्थिति को सही करने के लिए व्यापक और गैर-निहित अधिकार हैं.

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26 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आधार नंबर की अनिवार्यता और इससे निजता के उल्लंघन पर अहम फ़ैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संवैधानिक बेंच में से चार जजों ने बहुमत से कहा था कि आधार नंबर संवैधानिक रूप से वैध है. हालांकि पांच जजों वाली बेंच ने आधार पर सर्वसम्मति से फ़ैसला नहीं सुनाया था. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने आधार नंबर को पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया था. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि आधार को मनी बिल की तरह पास करना संविधान से धोखा है. इस बेंच में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.