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सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में नाबालिगों की गैरकानूनी हिरासत वाली याचिका का किया निपटारा

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कश्मीर में नाबालिगों की गैरकानूनी हिरासत को लेकर दाखिल याचिका का निपटारा किया. जस्टिस एनवी रमणा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत को जो रिपोर्ट मिली है उससे बेंच संतुष्ट है.

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सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में नाबालिगों की गैरकानूनी हिरासत वाली याचिका का किया निपटारा

जस्टिस एनवी रमणा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने केस का निपटारा किया. (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. कश्मीर में नाबालिगों की हिरासत का मामला
  2. सुप्रीम कोर्ट ने किया याचिका का निपटारा
  3. नाबालिगों की जरूरत के मुताबिक मुहैया कराएं सुविधाएं
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शुक्रवार को कश्मीर में नाबालिगों की गैरकानूनी हिरासत को लेकर दाखिल याचिका का निपटारा किया. जस्टिस एनवी रमणा की अगुवाई वाली तीन-सदस्यीय पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत को जो रिपोर्ट मिली है, उससे बेंच संतुष्ट है. किसी तरह के निर्देश देने की फिलहाल कोई जरूरत नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को निर्देश दिया कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस (NIMHANS) के मानसिक रोग विशेषज्ञ (Psychiatrist) की सेवाएं मेडिकल अफसरों की जरूरत के मुताबिक उन्हें मुहैया कराई जाएं. इसके अलावा अगर किसी को कोई परेशानी हो तो वो उचित मंच पर मामला उठा सकता है. केस की सुनवाई खत्म होने के बाद बाल अधिकार कार्यकर्ता इनाक्षी गांगुली ने सॉलिसिटर जनरल से हाथ मिलाया.

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बताते चलें कि बीती 5 नवंबर को शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की चार सदस्यीय किशोर न्याय समिति को राज्य में अनुच्छेद-370 के अनेक प्रावधान रद्द करने के निर्णय के बाद सुरक्षा बलों द्वारा नाबालिगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के आरोपों की नए सिरे से जांच का आदेश दिया था. न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई इस मामले की सुनवाई कर रहे थे.

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सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई कमेटी की रिपोर्ट में अदालत को बताया गया था कि केंद्र सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद राज्य में 144 नाबालिग हिरासत मे लिए गए थे लेकिन इनमें से 142 को बाद में रिहा कर दिया गया था. दो नाबालिगों को बाल सुधार गृह भेजा गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता व्यक्तिगत शिकायतों के समाधान के लिए उपयुक्त प्राधिकारी से संपर्क कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि हमें अपने स्वयं के न्यायाधीशों पर विश्वास करना होगा न कि वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट पर. केंद्र द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने के बाद बाल अधिकार कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली और शांता सिन्हा ने नाबालिगों को अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगाते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था.

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पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने सभी जेलों का दौरा किया और जांच की. हिरासत में कोई नाबालिग नहीं पाया. न्यायमूर्ति बीआर गवई ने याचिकाकर्ताओं से कहा, क्या हम उच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों  पर  भरोसा करें या वाशिंगटन पोस्ट अखबार में छपी कुछ रिपोर्ट के आधार पर इस तथ्य पर भरोसा करना चाहिए?

न्यायमूर्ति गवई ने यह भी कहा कि अगर उन्हें हिरासत में लिया जाता है और उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया जाता है, कभी-कभी यह उनके हित में होता है. आपको नहीं पता कि 13 और 14 साल की उम्र के बच्चे क्या-क्या करते हैं. इसलिए आईपीसी 376 में संशोधन किया गया है. न्यायमूर्ति एनवी रमना ने कहा हम अपने जजों की रिपोर्ट की समीक्षा नहीं कर सकते.



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