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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्रा, जिन्‍होंने दो दिनों में सुनाई पांच सजा-ए-मौत...

63 वर्षीय जस्टिस दीपक मिश्रा, के लिए पिछले तीन दिनों में यह दूसरा बड़ा रेप और मर्डर का केस था.

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्रा, जिन्‍होंने दो दिनों में सुनाई पांच सजा-ए-मौत...
नई दिल्‍ली: निर्भया गैंगरेप केस में चारों दोषियों की मौत की सजा पर मुहर लगाने वाली बेंच की अध्‍यक्षता करने वाले जस्टिस दीपक मिश्रा अगस्त में भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश बनने जा रहे हैं.

63 वर्षीय जस्टिस मिश्रा, के लिए इन तीन दिनों में यह दूसरा बड़ा रेप और मर्डर का केस था.

बुधवार को ही उन्‍होंने साल 2008 में एक चार वर्षीय बच्‍ची के साथ दुष्‍कर्म और हत्‍या करने के मामले में दोषी वसंत दुपारे की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था. नागपुर के इस मामले में दुपारे को 2008 में बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी. दुपारे ने अपने पड़ोस की इस बच्ची को बहलाने और फुसलाने के बाद उससे बलात्कार किया और फिर दो भारी पत्थरों से मारकर उसकी हत्या कर दी थी.

पीठ ने दुपारे की अर्जी को ठुकराते हुए कहा था कि जिस बर्बर तरीके से चार साल की बच्ची की हत्या की गई है वह निश्चित ही उसकी परिस्थितियों को कम करने की तुलना में कहीं अधिक महत्व रखता है. शीर्ष अदालत ने दोषी की मौत की सजा बरकरार रखते हुए कहा था कि एक नाबालिग बालिका के साथ बलात्कार रात के अंधेरे में उसकी गरिमा को वहशी तरीके से नष्ट करने के अलावा कुछ नहीं है. 

आज भी, जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण के साथ फैसला सुनाते हुए दिसंबर 2012 में चलती बस में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ गैंगरेप करने के दोषियों पर कड़े शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया. पीठ ने अपने फैसले में दोषियों के हाथों सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई इस छात्रा के साथ इस अपराध के बाद उसके गुप्तांग में लोहे की रॉड डालने, चलती बस से उसे और उसके दोस्त को फेंकने और फिर उन पर बस चढ़ाने का प्रयास करने जैसे दिल दहलाने वाले अत्याचारों के विवरण का जिक्र किया.

न्यायालय ने कहा कि इस अपराध की किस्म और इसके तरीके ने सामाजिक भरोसे को नष्ट कर दिया और यह बिरले में बिरलतम की श्रेणी में आता है, जिसमें मौत की सजा दी जानी चाहिए.

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न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, "यह एक अलग दुनिया की कहानी जैसी है, जहां मानवता के साथ अनादर किया गया है."

जुलाई 2015 में, जस्टिस दीपक मिश्रा ने तीन जजों के साथ आतंकी याकूब मेमन की अपील पर अंतिम पलों में ऐतिहासिक सुनवाई की थी. 1993 मुंबई बम धमाकों के मामले में यह सुनवाई हुई थी, जिसमें याकूब की अपील नामंजूर कर दी गई थी, जिसके कुछ वक्‍त बाद ही उसकी फांसी की सजा की तामील कर दी गई थी.


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