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जजों के नाम पर घूस लेने का मामला : सुप्रीम कोर्ट ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा

मेडिकल कालेजों को राहत पहुंचाने के लिए जजों के नाम पर घूस लेने के मामले में खचाखच भरे कोर्ट रूम में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रखा लिया है.

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जजों के नाम पर घूस लेने का मामला : सुप्रीम कोर्ट ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. मेडिकल कालेजों को राहत पहुंचाने के लिए जजों के नाम घूस लेने का मामला.
  2. सुप्रीम कोर्ट ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा.
  3. मंगलवार को कामिनी जायसवाल की याचिका पर संज्ञान लेगा सुप्रीम कोर्ट.
नई दिल्ली: मेडिकल कॉलेजों को राहत पहुंचाने के लिए जजों के नाम पर घूस लेने के मामले में खचाखच भरे कोर्ट रूम में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 90 मिनट की सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रखा लिया है. कोर्ट का हाल ये था कि एजी के.के. वेणुगोपाल भी कोर्ट रूम में नहीं घुस पाए और उन्हें जज कॉरीडोर से कोर्टरूम में ले जाया गया. अब सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को ये तय करेगा कि कामिनी जायसवाल की याचिका पर सुनवाई की जाए या नहीं? 

सुनवाई के दौरान जस्टिस अरूण मिश्रा ने पूछा कि जब पहली याचिका जस्टिस सिकरी की कोर्ट शुक्रवार के लिए सुनवाई के लिए लिस्टेड थी तो दूसरी याचिका दाखिल करने की जल्दी क्या थी? इस तरह के आरोप बेकार हैं और अवमानना के तहत हैं, जैसा कि पहले तीन जजों की बेंच ने फैसला दिया था. हम इस बारे मे भी चिंतित हैं कि जब एक केस पहले से लिस्ट किया गया है तो दूसरे नंबर के जज के पास केस क्यों गया? ये संस्थान को बदनाम करने के लिए सोच समझकर किया गया फैसला है, क्योंकि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी संस्थान का ही हिस्सा हैं.

याचिकाकर्ता के वकील शांति भूषण ने कहा-
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शांति भूषण ने कहा कि मामले में पाया गया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए घूस ली गई थी. न्यायिक या प्रशासनिक आदेश जारी नहीं कर सकते थे तो मामले को जस्टिस चेलामेश्वर के सामने मेंशन किया गया. जिन्होंने उसी दिन इस केस को लेकर बिल्कुल सही फैसला दिया. प्रशांत भूषण ने कहा कि जस्टिस खानवेलकर को ये केस नहीं सुनना चाहिए क्योंकि वो भी मेडिकल कॉलेज के फैसले में शामिल थे. लेकिन जस्टिस खानवेलकर ने इससे इंकार कर दिया.

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प्रशांत भूषण ने कहा कि तब मेरिट पर मामले में बहस नहीं करेंगे. आगे शांति भूषण ने कहा कि संविधान का आर्टिकल 144 कहता है कि अगर कोई बेंच आदेश जारी करती है तो CJI को भी इसे मानना होगा. वो इसके बाद कोई ओर आदेश जारी नहीं कर सकते. वहीं, AG के के वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता ने जिस तरह CJI पर आरोप लगाए हैं, ये अदालत की अवमानना का मामला बनता है.

पांच जजों की संविधान पीठ ने पहले फैसला रद्द किया था
इससे पहले नाटकीय क्रम में शुक्रवार को पांच जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को जस्टिस जे चेलामेश्वर की बेंच के मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने के फैसले को रद्द कर दिया था. ये याचिका वकील कामिनी जयसवाल ने दाखिल की है. याचिका में कहा गया है कि इस पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस की निगरानी में SIT से कराई जाए. इस मामले में हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज आरोपी हैं और सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम पर पैसे लिए गए. 

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18 सितंबर को ये मामला सुप्रीम कोर्ट ने सुना और 19 सितंबर को सीबीआई ने FIR दर्ज की. लेकिन इस बड़े मामले में आरोपियों को जमानत मिल गई लेकिन सीबीआई ने अपील नहीं की. ऐसे में ये खतरा है कि वो सबूतों से छेड़छाड़ कर सकती है. उन्होंने कहा कि इस मामले में चीफ जस्टिस को सुनवाई से अलग होना चाहिए और वो इस मामले में कोई न्यायिक व प्रशासनिक आदेश जारी ना करें.
 
मेडिकल कॉलेजों को राहत पुहंचाने का है मामला
मेडिकल कॉलेज को राहत दिलाने के लिए रिश्वत की लेन-देन के आरोपों में फंसे ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज आइएम कुदुसी को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था. कुदुसी पर भुवनेश्वर के एक बिचौलिये के मार्फत सुप्रीम कोर्ट से 46 मेडिकल कालेजों में नामांकन पर लगे प्रतिबंध से राहत दिलाने की साजिश रचने का आरोप है. कुदुसी के साथ-साथ बिचौलिये की भूमिका निभाने वाले मेरठ के वेंकेंटश्वर मेडिकल कालेज के सुधीर गिरी, कुदुसी की करीबी भावना पांडेय, सुप्रीम कोर्ट में ऊंचे संपर्को का दावा करने वाले विश्वनाथ अग्रवाल, हवाला डीलर रामदेव सारस्वत के साथ-साथ रिश्वत देने वाले लखनऊ के प्रसाद इंस्टिट्यूट आफ मेडिकल साइंसेंस के मालिक बीडी यादव और पलाश यादव को गिरफ्तार किया गया है. 

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सीबीआई ने ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज आई एम कुदुसी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है. ये FIR प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 और IPC की धारा 120 B के तहत साजिश रचने के तहत दर्ज किया गया है.  FIR के मुताबिक कुदुसी ने भावना पांडेय के साथ मिलकर लखनऊ के प्रसाद इंस्टिटयूट ऑफ मेडिकल साइंस के मामले को सेटल करने की साजिश रची. ये उन 46 कॉलेज में से एक था जिस पर सरकार ने रोक लगा दी थी. इन कॉलेजों पर सरकार ने एक या दो साल के लिए मेडिकल सीटों पर दाखिले करने पर रोक लगा दी थी क्योंकि इनमें सुविधाएं मानक के अनुरूप नहीं थीं और ये तय मापदंडों को पूरा नहीं करते थे.
 
क्या है पूरा घटनाक्रम
FIR में बताया गया है कि मेडिकल इंस्टिटयूट का प्रबंधन संभालने वाले बीपी यादव कुदुसी और पांडेय के संपर्क में आए और फिर मामले को सेटल करने के लिए साजिश रची गई. कुदुसी ने उन्हें राय दी कि इस रोक के खिलाफ दाखिल अर्जी को वो सुप्रीम कोर्ट से वापस ले लें और इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल करें. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार के रोक के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी. जब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया इस मामले में फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कुदुसी और पांडेय ने यादव को भरोसा दिलाया कि वो अपने संपर्कों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में भी मामले को सेटल करा देंगे.
 
FIR के मुताबिक, उन्होंने इस मामले में बिश्वनाथ अग्रवाला से संपर्क किया जो संबंधित वरिष्ठ पदाधिकारियों से नजदीकी रिश्ते होने का दावा करते हैं. उन्होंने भी भरोसा दिया कि मामले को उनके पक्ष में सेटल कराया जाएगा. इसके एवज में अग्रवाला ने मोटी रकम घूस के तौर पर मांगी और इसी साजिश के तहत वो जल्द ही घूस देने के लिए दिल्ली में मीटिंग करने वाले थे. इसी के चलते कुदुसी भावना पांडेय, यादव और अग्रवाला के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.

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बीपी यादव के साथ कॉलेज का काम संभालने वाले पलाश यादव और साजिशकर्ताओं के बीच मीटिंग कराने वाले सुधीर गिरी के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है. गिरी वैंकेटश्वरा ग्रुप ऑफ इंस्टिटयूशन्स का फाउंडर है. इसी केस में सीबीआई ने पूर्व जज के खिलाफ केस दर्ज करने के बाद गलती से हाईकोर्ट के वर्तमान जज जस्टिस सी आर दास के घर रेड कर दी थी. हालांकि, बाद में सीबीआई ने माफी मांग ली थी.

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