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समलैंगिकता पर कोर्ट के फैसले के साथ सरकार

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  1. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने समलैंगिकता पर हाई कोर्ट के फैसले के साथ होने की बात कही है।
नई दिल्ली:

पहले के अपने रूख से उलट केंद्र ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर लाने का पक्ष लिया। केंद्र के बदलते रूख पर नाराजगी जताते हुए शीर्ष न्यायालय ने टिप्पणी की कि सरकार को व्यवस्था का ‘मजाक’ नहीं बनाना चाहिए।

इस विवादित मामले में कार्यवाही शुरू होने पर , अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मोहन जैन ने पीठ से कहा कि सरकारी फैसले के मुताबिक 2009 में समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से अदालत में उपस्थित जैन का रूख केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस मामले में हाजिर हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पी पी मल्होत्रा की दलील से उलट है जिन्होंेने इसका विरोध किया था।

सरकार के बदलते रूख पर कड़ी टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस जे मुखोपाध्याय ने केंद्र की खिंचाई की और उनसे कहा कि वे व्यवस्था का मजाक नहीं बनाएं।


उच्चतम न्यायालय की पीठ ने केंद्र को फटकार लगाते हुए कहा, ‘‘व्यवस्था का ‘मजाक’ नहीं बनाइए। एएसजी मल्होत्रा पहले ही इस मामले में तीन घंटों से ज्यादा दलील दे चुके हैं। अदालत का समय बर्बाद नहीं कीजिए।’’ पीठ ने जैन को कहा, ‘‘हमनें गृह मंत्रालय द्वारा रखी गई दलीलों को लिखा। इसलिए अब आप अपने मंत्रालय का रूख बताइए।’’ न्यायालय ने जैन को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में दलील रखने की इजाजत दी।

मामले में 23 फरवरी को पिछली सुनवाई के दौरान सरकार ने समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से मुक्त किए जाने पर असहमति जताते हुए इसे ‘बेहद अनैतिक’ करार दिया था लेकिन बाद में उसने अपना रूख बदल लिया जिसकी पीठ ने तीखी आलोचना की।

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केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से हाजिर एएसजी पी पी मल्होत्रा ने दलील थी कि समलैंगिक विवाह सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ है और भारतीय समाज विदेशों में मौजूद प्रथाओं की नकल नहीं कर सकता।

मीडिया द्वारा खबरों में सरकार का रूख दिए जाने पर गृह मंत्रालय ने तत्काल खुद को अलग करते हुए इस मुद्दे पर अपना वक्तव्य जारी किया और कहा कि उसने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर कोई राय नहीं बनाई है।



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