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पुलिसकर्मियों की भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाई फटकार, रोडमैप ठुकराया

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पुलिसकर्मियों की भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाई फटकार, रोडमैप ठुकराया
नई दिल्‍ली: देशभर में पुलिसकर्मियों की भर्तियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाई फटकार है. सरकार के रोडमैप पर न्‍यायालय ने मंगलवार को गहरी नाराजगी जताई. चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि ऐसे प्रस्ताव देने वाले को जेल भेज देना चाहिए. सरकार हमारा मजाक ना बनाए, हम सरकार के पुलिसकर्मियों की भर्ती पर नजर रख रहे हैं. 

चीफ जस्टिस ने कहा कि सरकार कह रही है कि जुलाई 2019 यानी ढाई साल में 86 स्टेनोग्राफर की भर्ती पूरी होगी... क्या इस काम में इतना वक्त लगेगा? आपको चाहिए कि स्टेनोग्राफी टेस्ट करें और लोगों का चयन करें. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के रोडमैप को भी ठुकरा दिया और नए रोडमैप के साथ शुक्रवार को दोबारा एडिशनल सेकेट्री को पेश होने को कहा.

वहीं, कई सवाल-जवाब करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के रोडमैप पर मुहर लगाई. इसके मुताबिक, राज्य सरकार 25,487 सिपाहियों के पदों में से 4,537 की रिक्तियां जुलाई 2017 में पूरी करेगी, जबकि अगले तीन सालों तक वो हर साल 8,000 कांस्टेबलों की भर्ती करेगी. इसी तरह 800 सब इंस्पेक्टरों की भर्ती 2020 तक पूरी होगी. राज्य में 76 डिप्टी SP की भर्तियों की प्रर्क्रिया को भी जल्द पूरी करने को कहा गया है. 

25 अप्रैल को सीजेआई जेएस खेहर की एक्स्ट्रा क्लास चली. इसमें यूपी समेत छह राज्यों के टॉप अफसर मौजूद रहे. चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें इतिहास-भूगोल नहीं चाहिए, यह बताइए कि पुलिसकर्मियों की रिक्तियां कब पूरी होंगी. कोर्ट 4 बजे के बजाए 5.36 बजे तक चला. वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस में खाली पदों के पूरी तरह भरे जाने तक हर साल 32 हजार पुलिसकर्मियों की भर्तियां होंगी. 

सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार के रोड मैप को मंजूरी दे दी थी. सरकार ने कहा है कि 11,376 सब इंस्पेक्टर की भर्ती जनवरी 2018 से शुरू होगी और जनवरी 2023 तक पूरी होगी. हर साल 3,200 सब इंस्‍पेक्‍टरों की भर्ती होगी. यही नहीं, 1,01,619 सिपाहियों की भर्ती अगस्त 2017 से शुरू होगी, जोकि सितंबर 2021 तक पूरी होगी. यानि हर साल 30 हज़ार सिपाहियों की भर्ती होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा है कि वह तय हलफ़नामे के मुताबिक ही भर्ती करे. अगर ऐसा नहीं किया गया तो प्रधान सचिव (गृह) निजी तौर पर जिम्मेदार होंगे. हर साल की भर्ती शुरू होने से और परिणाम घोषित होने तक पुलिस भर्ती बोर्ड का चेयरमैन नहीं बदला जाएगा.

सुनवाई में 6 राज्य यूपी, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के बड़े अफसरों को रोडमैप के साथ सुप्रीम कोर्ट ने तलब किया था. CJI खेहर ने कहा था कि यह मामला 2013 से लंबित है, लेकिन इन राज्यों में कुछ नहीं हुआ. नोटिस भेजने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया. अब कोर्ट इस मामले पर निगरानी करेगा और भर्तियों पर नजर रखेगा. CJI ने यूपी सरकार से कहा कि है आप लोगों को रोजगार क्यों नहीं देते और इतने पद क्यों खाली हैं. हालांकि यूपी ने कहा कि इसके प्रयास जारी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में 1,51,679, बिहार में 34,000, झारखंड में 26,303, कर्नाटक में 24,399, तमिलनाडु में 19,803, बंगाल में 3,325 पुलिसकर्मियों की रिक्तियां हैं.

देश में पुलिसकर्मियों की भर्ती के मामले में पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के रवैये पर नाराजगी जताई थी. CJI खेहर ने कहा था कि कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए पुलिस के सभी पदों पर नियुक्तियां जरूरी हैं. सभी राज्यों के गृह सचिव तीन हफ्ते के भीतर हलफनामा दाखिल कर कोर्ट को बताएं कि पुलिसकर्मियों की नियुक्ति के लिए वो क्या कर रहे हैं? कितने पद खाली हैं? केंद्र सरकार एक हफ्ते के भीतर सभी राज्य सरकारों को कोर्ट का आदेश भेजे. कोर्ट ने चेतावनी दी कि जो राज्य हलफनामा दाखिल नहीं करेंगे, उनके गृह सचिव कोर्ट में तलब होंगे.

जस्टिस खेहर ने कहा कि 2015 का रिकॉर्ड बताता है कि देश में 4 लाख 33 हजार पुलिसकर्मियों की कमी है. 2014 में छतीसगढ़ का कहना था कि उनके यहां 3,800 पद खाली हैं और अब सरकार बता रही है कि 10,000 पुलिसकर्मियों की नियुक्ति होनी है. ऐसे में अब सब राज्य कोर्ट को बताएं कि उनके यहां कितने पद खाली हैं और क्या हो रहा है? कोर्ट देशभर की पुलिस के लिए कल्याणकारी योजनाओं के लिए दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है. याचिका में कहा गया है कि सभी सरकारी विभागों के लिए कमिशन बनाए गए हैं और सुविधाएं दी जा रही हैं, लेकिन पुलिस को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. देश में करीब 50 फीसदी पुलिसकर्मियों की कमी है और पुलिसवालों के लिए आवास और अन्य सुविधाएं भी नहीं हैं. इसकी वजह से कानून-व्यवस्था को बनाए रखने में दिक्कत हो रही है.


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