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नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी का मामला : कौन सा इस्लामिक कानून कब, कहां और कैसे लागू होगा, सुप्रीम कोर्ट में हो सकता है साफ

नाबालिग मुस्लिम लड़की का अपनी मर्जी से विवाह के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को तलब किया है.  सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भरे लहजे में कहा है कि सरकार को ऐसे मामले में फर्क नहीं पड़ता है इसलिए गृह सचिव 23 सितंबर को हाजिर हों.

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नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी का मामला :  कौन सा इस्लामिक कानून कब, कहां और कैसे लागू होगा, सुप्रीम कोर्ट में हो सकता है साफ

नााबालिग मुस्लिम लड़की की शादी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.

खास बातें

  1. मुस्लिम लड़की ने की थी शादी
  2. हाईकोर्ट ने शादी को शून्य करार दिया
  3. लड़की ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई गुहार
नई दिल्ली:

नाबालिग मुस्लिम लड़की का अपनी मर्जी से विवाह के मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को तलब किया है.  सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भरे लहजे में कहा है कि सरकार को ऐसे मामले में फर्क नहीं पड़ता है इसलिए गृह सचिव 23 सितंबर को हाजिर हों. दरअसल एक मुस्लिम नाबालिग लड़की ने अपनी मर्जी से विवाह किया था जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया और लड़की को नारी निकेतन भेज दिया. लड़की ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि रजोस्वला ( प्यूबर्टी) होने के बाद मुस्लिम लड़की को शादी का अधिकार मिल जाता है. उसने मुस्लिम कानून के हिसाब से निकाह किया है और अपनी वैवाहिक जिंदगी जीने को आजाद है.  इसी आधार पर शादी की तय संवैधानिक उम्र 18 साल होने से पहले किए गए अपने विवाह को वैध घोषित करने की गुहार लगाई.  सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि वह शादीशुदा है. ऐसे में उसे दांपत्य जीवन बसर करने की इजाजत दी जाए. 

आपको बता दें कि लड़की उत्तर प्रदेश के अयोध्या की रहने वाली है. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने इस मामले में दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान इसे विस्तार से सुनने के लिए सहमति दी है और  यूपी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि क्यों ना याचिकाकर्ता को इसकी इजाज़त दी जाए. दरअसल शादी के वक्त लड़की की उम्र 16 साल बताए जाने के बाद निचली अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि लड़की नाबालिग है ऐसे में उसे शेल्टर होम भेजा जाए. इसके बाद लड़की ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी.


 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता लड़की नाबालिग है और वह अपने माता पिता के साथ नहीं रहना चाहती, लिहाजा उसे शेल्टर होम में भेजने का आदेश सही है. इस आदेश के साथ ही हाईकोर्ट ने शादी को शून्य करार दे दिया.  वहीं इस लड़की ने अपने वकील दुष्यंत पाराशर के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हाईकोर्ट इस तथ्य को मानने में विफल रहा है कि उसका निकाह मुस्लिम कानून के अनुसार हुआ है.  याचिका में लड़की ने अपने जीने, धार्मिक मान्यताओं का पालन करने और स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए दलील दी है कि वह एक युवक से प्रेम करती है और इस साल जून में मुस्लिम कानून के अनुसार उनका निकाह हो चुका है.

कथित निकाह के बाद लड़की के पिता ने लड़के के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कराया था.  लड़की के पिता ने पुलिस को दर्ज कराई गई शिकायत में कहा कि एक युवक ने अपने साथियों के साथ मिलकर उसकी बेटी का अपहरण कर लिया है. हालांकि, लड़की ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए अपने बयान में कहा है कि उसने उस व्यक्ति से अपनी मर्जी से शादी की है. वह उसके ही साथ रहना चाहती है.  फिलहाल अब सुप्रीम कोर्ट इस विवाद को नए नज़रिए से सुनेगा यानी मुस्लिम आबादी के लिए देश का कानून और इस्लामिक कानून में से कौन सा कब, कहां और कैसे लागू होगा यह भी साफ होगा.

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