जम्मू-कश्मीर में 4G इंटरनेट बहाली पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज

याचिका में दी गई दलील - इंटरनेट के जरिए डॉक्टरों तक पहुंचने का अधिकार, जीने के अधिकार के तहत आता है

जम्मू-कश्मीर में 4G इंटरनेट बहाली पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज

प्रतीकात्मक फोटो.

नई दिल्ली:

जम्मू-कश्मीर में 4जी इंटरनेट बहाली की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को फैसला सुनाएगा. कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा लिया है. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि मौजूदा 2जी सर्विस के चलते बच्चों की पढ़ाई, कारोबार में दिक्कत आ रही है. कोरोना महामारी के बीच राज्य में लोग वीडियो कॉल के जरिए डॉक्टरों से ज़रूरी सलाह नहीं ले पा रहे हैं. इंटरनेट के जरिए डॉक्टरों तक पहुंचने का अधिकार, जीने के अधिकार के तहत आता है. लोगों को डॉक्टर तक पहुंचने से रोकना उन्हें आर्टिकल 19, 21 के तहत मिले  मूल अधिकार से वंचित करना है.

अहमदी ने कहा कि अभी राज्य में 701 कोरोना के केस हैं, आठ की मौत हो चुकी है. इंटरनेट स्पीड बाधित होने के चलते कोरोना इलाज को लेकर डॉक्टरो को जरूरी जानकारी नहीं मिल पा रही है. करीब 75 डॉक्टर इसे लेकर सरकार को ज्ञापन दे चुके हैं लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं हुआ.

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दि कि  जम्मू कश्मीर में इंटरनेट स्पीड पर नियंत्रण आंतरिक सुरक्षा के लिए ज़रूरी है. राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है. ये फैसला सरकार पर छोड़ देना चाहिए. देश की सम्प्रभुता से जुड़े ऐसे मसलों पर सार्वजनिक तौर पर या कोर्ट में बहस नहीं की जा सकती. कोर्ट को इस मसले में दखल नहीं देना चाहिए.

इस मामले में पिछले बुधवार को जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामें में जवाब दाखिल कर याचिका ख़ारिज करने की बात कही थी. तर्क दिया गया था कि 4जी का इस्तेमाल आतंकी करेंगे इसलिए यह नहीं लागू किया जा सकता है. सभी ज़रूरी सेवाएं 2जी के सहारे चल रहीं हैं. राज्य में आंतरिक सुरक्षा को खतरा बना हुआ है. मोबाइल इंटरनेट 2जी रखने से भड़काऊ सामग्री के प्रसार पर अंकुश, फिक्स लाइन इंटरनेट बिना स्पीड लिमिट उपलब्ध है. छात्रों के लिए शिक्षा सामग्री उपलब्ध है जो 2जी इंटरनेट से हासिल करना संभव है. 

राज्य प्रशासन ने कहा कि इस बात की पहले से ही आशंका थी कि जम्मू कश्मीर में आतंकी हिंसा को फैलाने, कानून व्यवस्था का संकट पैदा करने के लिए इंटरनेट के जरिए फर्जी वीडियो, तस्वीरें और भड़काऊ सामग्री का प्रचार किया जाएगा. राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका के रूप में अपनी याचिका दायर की है लेकिन इंटरनेट सेवा की मांग करना मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आता है.

पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि डॉक्टर से बात करने के लिए, छात्रों की ऑनलाइन क्लास के लिए 4जी सेवा की बहाली जरूरी है. याचिका के जवाब में केन्द्र सरकार की तरफ़ से अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वहां अभी भी आतंकवाद है, आतंकवादी 4जी का इस्तेमाल आंतकी गतिविधियों के लिए करेंगे.

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सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कुछ इलाकों में तो बहाल किया जा सकता है लेकिन हर जगह नहीं,  राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है. अनुमति नही मिलनी चाहिए. जिस पर सुनवाई के जस्टिस रमना ने कहा कि आपको जो कहना है, हलफनामा दाखिल कीजिए. वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुछ इलाकों में तो 4जी इंटरनेट सेवा बहाल की जा सकती है लेकिन हर जगह संभव नहीं है. कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से रविवार तक हलफनामा दाखिल करने का दिया आदेश दिया था.

फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स की ओर से दायर जनहित याचिका में सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें मोबाइल इंटरनेट की गति 2जी तक ही सीमित रखी गई है. याचिका में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर की जनता को 4जी इंटरनेट सेवाओं से वंचित रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21ए का उल्लंघन है.