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अमेरिका में 'साइक्लोनिक हिन्दू' के नाम से पुकारे जाते थे स्वामी विवेकानंद...

उनकी वक्तव्य-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए स्थानीय मीडिया ने उन्हें 'साइक्लोनिक हिन्दू' का नाम दिया था.

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अमेरिका में 'साइक्लोनिक हिन्दू' के नाम से पुकारे जाते थे स्वामी विवेकानंद...

अमेरिका में 'साइक्लोनिक हिन्दू' के नाम से पुकारे जाते थे स्वामी विवेकानंद... (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: हिन्दुस्तान में शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जिसने स्वामी विवेकानंद का नाम न सुना हो. देश के सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरुओं में शुमार किए जाने वाले स्वामी विवेकानंद को आमतौर पर अमेरिका के शिकागो में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने भारत के आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदांत दर्शन को सारी दुनिया के समक्ष पहुंचा दिया था.

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नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता के एक कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद के पिता कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील थे. बचपन से कुशाग्रबुद्धि स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा जाता है कि अपने दादा, पिता और मां के धार्मिक, तर्कसंगत और प्रगतिशील स्वभाव का असर उन पर भी बचपन से ही हुआ, और वह विलक्षण याददाश्त के मालिक भी बताए जाते थे.

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स्वामी विवेकानंद दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य आदि विषयों में खासी रुचि रखते थे, तथा उन्होंने वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त हिन्दू शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था. वह भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे, और नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम व खेलों में भी भाग लिया करते थे.

बचपन से ही आध्यात्मिकता की ओर झुकाव रखने वाले स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से बेहद प्रभावित थे, और उन्होंने उन्हीं से सभी जीवों को परमात्मा का अवतार मानते हुए सभी की सेवा करना सीखा और उसी को परमात्मा की सेवा करना माना. गुरु के देहांत के बाद स्वामी विवेकानंद ने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में कई यात्राएं कीं, और फिर 1893 में विश्व धर्म संसद में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए ऐतिहासिक भाषण में समूचे मानव समाज को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की शिक्षा दी.

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25 वर्ष की आयु में गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने वाले स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे देश की यात्रा भी की थी. अपने ऐतिहासिक भाषण के बाद वह तीन वर्ष तक अमेरिका में ही रहे थे, और उनकी वक्तव्य-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए स्थानीय मीडिया ने उन्हें 'साइक्लोनिक हिन्दू' का नाम दिया था. 39 वर्ष की आयु में ही संसार को त्याग गए स्वामी विवेकानंद का मानना था कि अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना सारी दुनिया अनाथ होकर रह जाएगी, सो, इसी विचार के प्रसार के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं अमेरिका में भी स्थापित कीं, जहां बहुत-से अमेरिकी नागरिक भी उनके शिष्य बने.


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