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तीन तलाक 1400 साल से चल रहा है, यह आस्था से जुड़ा मामला : सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल

AIMPLB बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा- तीन तलाक 1400 साल पुरानी प्रथा है और यह स्वीकार की गई है. यह मामला आस्था से जुडा है, जो 1400 साल से चल रहा है तो ये गैर-इस्लामिक कैसे है.

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तीन तलाक 1400 साल से चल रहा है, यह आस्था से जुड़ा मामला : सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल

सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक पर सुनवाई

खास बातें

  1. 1400 साल पुरानी प्रथा तो गैर-इस्लामिक कैसे
  2. यह आस्था से जुड़ा विषय है
  3. क्या कोर्ट कुरान में लिखे लाखों शब्दों की व्याख्या करेगा
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक पर सुनवाई जारी है. AIMPLB बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा- तीन तलाक 1400 साल पुरानी प्रथा है और यह स्वीकार की गई है. यह मामला आस्था से जुडा है, जो 1400 साल से चल रहा है तो ये गैर-इस्लामिक कैसे है. जैसे मान लीजिए मेरी आस्था राम में है और मेरा यह मानना है कि राम अयोध्या में पैदा हुए. अगर राम को लेकर आस्था पर सवाल नहीं उठाए जा सकते तो तीन तलाक पर क्यों? यह सारा मामला आस्था से जुडा है. पर्सनल लॉ कुरान और हदीस से आया है. क्या कोर्ट कुरान में लिखे लाखों शब्दों की व्याख्या करेगा? संवैधानिक नैतिकता और समानता का सिद्धांत तीन तलाक पर लागू नहीं हो सकता क्योंकि यह आस्था का विषय है.

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने हिन्दुओं से तुलना की. संविधान सभी धर्मों के पर्सनल लॉ को पहचान देता है . हिंदुओं में दहेज के खिलाफ दहेज उन्मूलन एक्ट लेकर आए, लेकिन प्रथा के तौर पर दहेज लिया जा सकता है.  इस तरह हिंदुओं में इस प्रथा को सरंक्षण दिया गया है तो वहीं मुस्लिम के मामले में इसे अंसवैधानिक करार दिया जा रहा है. कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए नहीं तो सवाल उठेगा कि इस मामले को क्यों सुना जा रहा है? क्यों संज्ञान लिया गया. शरियत पर्सनल लॉ है, इसकी तुलना मौलिक अधिकारों के आधार पर नहीं की जा सकती. हमें हर धर्म की संस्कृति को सरंक्षण देना चाहिए. अगर वह खराब भी है तो लोगों को इसके विषय में शिक्षित करना चाहिए. महसूस कराया जाना चाहिए कि वे गलत हैं और कानून बनाना चाहिए.  हर मुस्लिम बहुसंख्यक देश में हिन्दुओं को सरंक्षण मिलना चाहिए और उसी तरह हिन्दू बहुसंख्यक देश में मुस्लिमों को सरंक्षण मिले. 

जस्टिस कूरियन ने कपिल सिब्बल से कई बार पूछा- पवित्र कुरान में पहले से ही तलाक की प्रक्रिया बताई गई है तो फिर तीन तलाक की क्या जरूरत? जब कुरान में तीन तलाक का कोई जिक्र नहीं तो ये कहां से आया?  इस पर कपिल सिब्बल ने कहा- कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं है, लेकिन कहा गया है कि अल्लाह के मैसेंजर की बात मानो. अल्लाह के मैसेंजर और उनके साथियों से तीन तलाक की प्रथा शुरू हुई. ये आस्था का मामला है, कोर्ट इसकी व्याख्या नहीं कर सकता. जस्टिस कूरियन ने कहा - कम से कम हम ये तो पता लगा ही सकते हैं कि तीन तलाक आस्था का हिस्सा है या नहीं? 

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा इस मुद्दे पर समुदाय कुछ क्यों नहीं कर रहा. इस पर कपिल सिब्बल ने कहा- हम ये नहीं कह रहे कि तीन तलाक सही है. ये तलाक का सबसे अवांछनीय तरीका है.  हम सभी को समझा रहे हैं कि इसका इस्तेमाल ना करें. हम ये भी कह रहे हैं कि तीन तलाक परमानेंट नहीं है, लेकिन हम ये नहीं चाहते कि कोई दूसरा हमें बताए कि तीन तलाक खराब है. समुदाय के लोग ही इससे बाहर निकलेंगे.

इससे पूर्व सोमवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि विवाद सिर्फ तीन तलाक के मुद्दे को लेकर नहीं है, बल्कि समुदायों के बीच पुरुष प्रधानता की व्यापक मौजूदगी भी है. बोर्ड ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा कि सभी पुरुष प्रधान समाज भेदभाव करते हैं. उसके वकील कपिल सिब्बल ने पीठ से यह भी कहा कि पर्सनल लॉ और परंपरा एवं प्रथा में अंतर होता हैय

सिब्बल ने कहा, सभी पुरुष प्रधान समाज पक्षपाती हैं. हिंदू धर्म में पिता अपनी संपत्ति किसी को भी वसीयत कर सकता है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में ऐसा नहीं है. मैं हिंदू समाज में ऐसी कई परंपराओं की ओर इंगित कर सकता हूं. क्या यह सही है कि कोई महिला तलाक के लिए आवेदन करे और 16 साल तक संघर्ष करे और उसे कुछ हासिल नहीं हो. उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में बहुविवाह की प्रथा है, लेकिन इसे सुरक्षा हासिल है क्योंकि यह परंपरा है और सिर्फ समाज यह फैसला करेगा कि इसे कब बदला जाएगा. पर्सनल लॉ बोर्ड की दलीलें पेश करना अभी पूरा नहीं हुआ और ये कल जारी रहेंगी.
 


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