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'महामहिम' डॉ प्रणब मुखर्जी, जिन्हें 'महामहिम' कहे जाने से था ऐतराज़...

11 दिसंबर, 1935 को पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में जन्मे और एक स्कूली शिक्षक के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले डॉ प्रणब मुखर्जी अब भारत के 'पूर्व' राष्ट्रपति होने जा रहे हैं, और हमेशा अपने बेहद शालीन स्वभाव के लिए जाने जाते रहे...

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'महामहिम' डॉ प्रणब मुखर्जी, जिन्हें 'महामहिम' कहे जाने से था ऐतराज़...

डॉ प्रणब मुखर्जी अब भारत के 'पूर्व' राष्ट्रपति होने जा रहे हैं...

खास बातें

  1. 11 दिसंबर, 1935 को जन्मे डॉ मुखर्जी अब 'पूर्व' राष्ट्रपति होने जा रहे हैं
  2. प्रणब दा संयत रहा करते थे, और इस गुण की प्रशंसा विरोधी भी करते रहे हैं
  3. डॉ मुखर्जी गैर-विवादास्पद कार्यकाल की विरासत छोड़कर विदा ले रहे हैं
नई दिल्ली: देश के 13वें राष्ट्रपति के रूप में केंद्र सरकार के साथ बेहद आत्मीय संबंधों के लिए याद किए जाने वाले डॉ प्रणब मुखर्जी उन फैसलों के लिए भी याद किए जाएंगे, जिन्होंने अंग्रेज़ों के ज़माने से बसी सोच को बदलने का अहम काम किया... इन्हीं में से एक निर्णय था, राष्ट्रपति पद पर आसीन व्यक्ति के लिए 'हिज़ एक्सीलेंसी' और 'महामहिम' जैसे संबोधनों को प्रोटोकॉल से हटवा देना...

दरअसल, अंग्रेज़ों के ज़माने में वायसरॉय या गवर्नर जनरल, जो इंग्लैंड की महारानी के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया करते थे, के लिए इन दोनों संबोधनों का प्रयोग किया जाता था, और आज़ादी के बाद भी इस पद के साथ यही संबोधन चिपके रहे... लेकिन डॉ मुखर्जी पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जिन्होंने भारतीय मानसिकता में बस चुके इन संबोधनों को राष्ट्रपति पद से अलग किया...
 
11 दिसंबर, 1935 को पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में जन्मे और एक स्कूली शिक्षक के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले डॉ प्रणब मुखर्जी अब भारत के 'पूर्व' राष्ट्रपति होने जा रहे हैं, और हमेशा अपने बेहद शालीन स्वभाव के लिए जाने जाते रहे... राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में स्नातकोत्तर उपाधियां हासिल करने वाले डॉ मुखर्जी ने कानून की डिग्री भी प्राप्त की थी... केंद्र सरकार में बेहद अहम पदों को संभाल चुके प्रणब दा हमेशा संयत रहने के लिए मशहूर रहे हैं, और इस गुण की प्रशंसा उनके विरोधी भी करते रहे हैं...

देश के रक्षामंत्री तथा वित्तमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों को संभाल चुके डॉ प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति के रूप में भी कतई गैर-विवादास्पद कार्यकाल की विरासत छोड़कर विदा ले रहे हैं, और केंद्र सरकार से उनके संबंधों की मिसाल आने वाले समय में दी जाती रहेगी... इसके अलावा वह तुरंत फैसले लेने के लिए भी मशहूर रहने वाले हैं...

वीडियो : डॉ प्रणब मुखर्जी को दी गई औपचारिक विदाई...


उनसे पहले देश के राष्ट्रपति पद पर सुशोभित रहे गणमान्य व्यक्तित्वों के कार्यकाल के दौरान दया याचिकाओं के लंबित रहने का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन डॉ प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल में फांसी की सज़ा पाए अपराधियों की दया याचिकाओं पर जल्द निर्णय लेने का उदाहरण प्रस्तुत किया... मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के कसूरवार अजमल कसाब और संसद भवन पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफज़ल गुरु की फांसी की सज़ा पर डॉ मुखर्जी ने अविलंब मुहर लगाई... इन दोनों के अलावा उन्होंने याकूब मेमन के मृत्युदंड को पलटने से भी इंकार किया, और अपने पूरे कार्यकाल में कुल मिलाकर 28 अपराधियों की फांसी की सज़ा को बरकरार रखते हुए चार लोगों को क्षमा भी किया...

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डॉ प्रणब मुखर्जी ने वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आग्रह पर राजनीति में प्रवेश किया था, और पहली बार राज्यसभा के लिए चयनित हुए थे... वर्ष 1973 में डॉ मुखर्जी को केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बनाया गया, और उसके बाद वह चार बार - वर्ष 1975, 1981, 1993, 1999 - और राज्यसभा के लिए चुने गए... केंद्र सरकार के हिस्से के रूप में सभी कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के काल में उन्हें हमेशा 'संकटमोचक' के रूप में देखा जाता रहा था, क्योंकि वे वार्ता के ज़रिये किसी भी तरह की समस्या का हल निकालने में सिद्धहस्त माने जाते थे... नई सदी में वर्ष 2004 और 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में उन्होंने पार्टी का प्रतिनिधित्व सीधा चुनाव जीतकर संसद के निचले सदन में किया...
 
आपातकाल के तुरंत बाद हुई करारी हार के समय वह इंदिरा गांधी के सर्वाधिक करीबी नेता के रूप में उभरे, और वर्ष 1980 में कांग्रेस के पुनः सत्तासीन होने पर राज्यसभा में पार्टी के नेता बनाए गए... वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए की गई हत्या के बाद दरअसल डॉ मुखर्जी ही इस पद के सबसे प्रमुख दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने उस वक्त इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया...

सो, सरकार के प्रमुख के रूप में काम करने का डॉ मुखर्जी को अवसर नहीं मिला, लेकिन राष्ट्रप्रमुख के रूप में उन्होंने भी अपने पूर्ववर्तियों की ही तरह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम किया और अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए...


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