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क्या बदल रहा है नीतीश कुमार का मिजाज, ये हैं 4 कारण

सियासी हवा का रुख भांप कर कदम बढ़ाने में भले ही रामविलास पासवान को महारथ हासिल हो, मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अब राजनीति की दिशा के अनुरूप ही चलने में विश्वास रखते हैं.

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क्या बदल रहा है नीतीश कुमार का मिजाज, ये हैं 4 कारण

पीएम मोदी और सीएम नीतीश (फाइल फोटो)

पटना:

सियासी हवा का रुख भांप कर कदम बढ़ाने में भले ही रामविलास पासवान को महारथ हासिल हो, मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अब राजनीति की दिशा के अनुरूप ही चलने में विश्वास रखते हैं. पिछले काफी समय से उनके राजनीतिक फैसलों से अब यह प्रतीत होने लगा है कि नीतीश कुमार भी मौके पर चौका मारने में माहिर हो गये हैं और अब उऩका मूड भी बदलने लगा है. अभी 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब एक साल का वक्त बचा है, मगर नीतीश कुमार अभी से ही सियासी हिसाब-किताब बैठाने में लग गये हैं. राज्य से लेकर देश में जिस तरह से विपक्षी एकजुटता का नजारा दिख रहा है और जैसे-जैसे मोदी सरकार को घेरने के लिए महागठबंधऩ की कवायद तेज हो रही है, उसे देखते हुए सीएम नीतीश भी इस अवसर का फायदा उठाने की जुगत में भिड़ गये हैं. हालांकि, कुछ समय से उऩके अंदाज और जो सियासी चाल सामने आ रहे हैं, उसने सियासी गलियारों में भी एक नया शिगुफा छेड़ दिया है कि क्या 2019 में नीतीश एक बार फिर से बीजेपी का साथ छोड़ कांग्रेसनीत महागठबंधऩ का हिस्सा बनेंगे या फिर 2019 में बीजेपी से मोल-भाव करने के लिए नीतीश कुमार ये सब रच रहे हैं? जिस तरह से उनका स्टैंड मोदी सरकार और बीजेपी को लेकर दिख रहा है, उससे साफ लगने लगा है कि नीतीश कुमार का मिजाज बदलने लगा है. 

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अचानक विशेष राज्य के दर्जे की मांग करना
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अचानक एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की कवायद तेज करना यूं ही नहीं है. इसे भी राजनीतिक पंडित उनकी दूरगामी रणनीति बता रहे हैं. बताया जा रहा है कि विशेष राज्य के दर्जे की कवायद से वह सियासत को गोटी सेट करने में जुट गये हैं. राजद से नाता तोड़ने के बाद काफी समय तक नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, मगर कर्नाटक चुनाव में बीजेपी की हार और विपक्षी एकजुटता की झलक देखते हुए उन्होंने अपना सबसे पुराना सियासी दांव चला, जिसके दम पर कभी वह दोबारा सत्ता में आए थे. नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष सहायता देने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह को पत्र लिखा और कहा कि बिहार एवं पिछड़े राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को एक अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए. दरअसल, चारों ओर से घिरी बीजेपी पर परोक्षा दवाब बनाने की योजना नीतीश कुमार की अभी भी राजनीतिक पंडितों के समझ से परे है. नीतीश कुमार के बदलते सियासी मिजाज पर अटकलों का बाजार इसलिए भी गर्म है क्योंकि उनकी पार्टी ने भी कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बिहार को विशेष दर्जा देने से इनकार करना ‘अन्याय’ के बराबर है. 

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सांप्रदायिकता पर जब बीजेपी को दिया संदेश
रामनवमी पर बिहार के कई हिस्सों में हिंसा की खबरें आईं थीं. उस वक्त भी सीएम नीतीश ने दो टूक में बीजेपी को इशारा दिया था कि वह अपने राज्य में सांप्रदायिक्ता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगें. नीतीश कुमार ने सूबे में हुई सांप्रदायिक घटनाओं पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि न तो भ्रष्टाचार से समझौता किया और न ही सांप्रदायिकता को बर्दाश्त कर सकते हैं. दरअससल, नीतीश का ये बयान उनकी सहयोगी बीजेपी के लिए एक सीधा संदेश था. क्योंकि हिंसा के कई मामलों में बीजेपी नेताओं के नाम आ रहे थे. साथ ही भागलपुर में हिंसा में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे शाश्वत का भी नाम आया था. इतना ही नहीं, बेंगलुरु में भी जनता दल यूनाइटेड के कन्वेंशन में नीतीश कुमार ने इशारों में बीजेपी को कहा कि "आज देश मे तनाव का माहौल है और ऐसे माहौल में विकास नहीं हो सकता. समाज में एक तनावपूर्ण माहौल पैदा हुआ है लेकिन मेरी समझ से ये ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है."

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जब मोदी सरकार के चार साल पर बधाई देने से बचे नीतीश
सीएम नीतीश कुमार के बदलते मिजाज पर अटकलों को बल उस वक्त मिला, जब पटना में एक कार्यक्रम के दौरान मोदी सरकार के चार साल के मौके पर नीतीश कुमार पत्रकारों के सवालों से बचते नजर आए. जब मोदी सरकार के चार साल पर सीएम नीतीश से पत्रकारों ने उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो वह बिना कुछ टिप्पणी किये चुपचाप निकल गये. पत्रकारों ने जब नीतीश से पूछा कि नरेंद्र मोदी के चार साल पर क्या कहेंगे तो वो टाल गए और पीछे की ओर इशारा करते हुए कहा, 'मेरी तरफ से जवाब सुशील जी (सुशील मोदी) देंगे'. हालांकि, बाद में अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से मोदी सरकार के चार साल पर नीतीश कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया दी. मगर उनके ट्वीट ने भी एक अलग तरह का संकेत दिया. नीतीश कुमार ने पीएम मोदी को चार साल के मौके पर बधाई तो दी, मगर उन्होंने एक खुला राजनीतिक विकल्प छोड़े रखा. नीतीश कुमार ने खुले तौर पर मोदी सरकार की उपलब्धियों को नहीं गिनाया, बल्कि मोदी सरकार को उन्होंने जिम्मेदारियों का एहसास कराया कि अभी भी उसे लोगों को विश्वास पर खरा उतरना है. यह अंतिम लाइन नीतीश कुमार की उस चालाकी का उदाहरण है, जो वह अक्सर अपनाते हैं.

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पटना यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने से पीएम मोदी का इनकार
पिछले साल अक्टूबर में एक ऐसा मौका भी आया जब पीएम मोदी ने सामने मौजूद सीएम नीतीश की एक मांग को सिरे से खारिज कर दिया था. अगर राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो यह सीएम नीतीश के लिए किसी अपमान से कम नहीं था. दरअसल, नीतीश कुमार ने पटना यूनिवर्सिटी के लिए केंद्रीय दर्जा देने की मांग की थी, जिसे पीएम मोदी ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि केंद्रीय यूनिवर्सि‍टी बीते हुए कल की बात है. दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जहां पीएम मोदी बनाम नीतीश कुमार की पूरे देश में चर्चा चल रही थी, एक समय जब मोदी के सरीखे ही नीतीश कुमार का कद भी देश भर में बड़ा था, ऐसी स्थिति में पटना में सरेआम उनकी मांग को खारिज कर दिया जाना नीतीश कुमार के लिए किसी अपमान से कम नहीं था. नीतीश कुमार के सियासी मिजाज को समझने के लिए यह घटना जानना काफी अहम है, क्योंकि नीतीश कुमार ने पीएम मोदी से दिवाली गिफ्ट की अपेक्षा रखी थी, और उन्हें यकीन रहा होगा कि उनके कद को देखते हुए पीएम मोदी उनकी बात आसानी से मान जाएंगे, मगर नीतीश कुमार का दांव उल्टा पड़ गया और सबके सामने फजीहत झेलनी पड़ी. 

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