प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का बुंदेलखंड के हजारों किसानों को नहीं मिल रहा लाभ

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ बुंदेलखंड के हजारों किसानों को नहीं मिल रहा है. खुद बीजेपी के विधायक इस बाबत मुख्यमंत्री से लेकर कृषि मंत्रालय तक को पत्र लिख चुके हैं लेकिन उसके बावजूद मुआवजा नहीं मिला.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का बुंदेलखंड के हजारों किसानों को नहीं मिल रहा लाभ

प्रतीकात्मक तस्वीर

झांसी:

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ बुंदेलखंड के हजारों किसानों को नहीं मिल रहा है. खुद बीजेपी के विधायक इस बाबत मुख्यमंत्री से लेकर कृषि मंत्रालय तक को पत्र लिख चुके हैं लेकिन उसके बावजूद मुआवजा नहीं मिला. बुंदेलखंड में पिछले साल इस तरह के ओला पड़ने से हजारों हेक्टेयर खरीफ की फसल बरबाद हो गई और किसान दाने दाने को मोहताज हैं. कुदरत के इसी मार से बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने चार साल प्रधानमंत्री किसान बीमा योजना की धूम धड़ाके के साथ शुरुआत की थी. लेकिन उप्र के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड में 68 हजार किसानों का लाखों रुपए प्रीमियम काटने के बावजूद बीमा कंपनी मुआवजे की रकम नहीं दे रही हैं.

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दरअसल किसानों के नाम और आधार संख्या बैंकों में गलत अपलोड होने के चलते बीमा कंपनी इन गरीब किसानों को मुआवजा नहीं दे रही हैं. खुद झांसी के बीजेपी विधायक जवाहर राजपूत इस संबंध में दर्जनों इस तरह के पत्र मुख्यमंत्री से लेकर कृषि मंत्रालय को लिख कर रजिस्ट्रेशन का पोर्टल खोलने की गुहार लगा चुके हैं ताकि बुंदेलखंड के बदहाल किसानों को मुआवजा मिल सके.

झांसी में बीजेपी विधायक जवाहर सिंह राजपूत ने कहा, ''हम कई बार अधिकारियों से मुलाकात करके बोल चुके कि दो दिन के लिए वेबसाइट खोल दो तो इनका रजिस्ट्रेशन हो जाएगा मुआवजा मिल जाएगा.''

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में इसी तरह की तमाम शिकायतों के चलते कई राज्य या तो इस स्कीम से बाहर हो गए हैं या वो इससे निकलने की सोच रहे हैं. जानकार बताते हैं कि बीते तीन साल में फसल बीमा करने के  नाम पर कंपनियों ने 76000 करोड़ रुपए का प्रीमियम वसूला जबकि 60 हजार करोड़ रुपए ही किसानों को मुआवजा दिया.

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प्रधानमंत्री इस योजना के जरिए गरीब किसानों की आमदनी दुगनी करना चाहते हैं लेकिन बीमा कंपनियों का अपना मुनाफा दुगना करने पर जोर ज्यादा है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते प्राकृतिक आपदा बढ़ी है और इसी चुनौती से निपटने के लिए किसानों की फसल को बीमा योजना का लाभ दिया गया था, लेकिन बीमा कंपनियां कृषि के क्षेत्र में अपना आधारभूत ढ़ांचा बढ़ा नहीं रही है. लिहाजा किसानों को मुआवजे के लिए अब भी सरकारी दफ्तरों के धक्के खाने पड़ रहे हैं.