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अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, रद्द करें तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह, केंद्र कानून बनाने को तैयार

केंद्र ने कहा कि इस मुद्दे पर कोई वैक्यूम नहीं है. केंद्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला को रद्द करे.

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अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, रद्द करें तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह, केंद्र कानून बनाने को तैयार

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

खास बातें

  1. केंद्र सरकार इस मुद्दे पर अपनी दलीलें देगा.
  2. सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों के संविधान पीठ में सुनवाई जारी रहेगी.
  3. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े सवाल उठाए थे.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह समय की कमी की वजह से सिर्फ ‘तीन तलाक’ पर सुनवाई करेगा लेकिन केन्द्र के जोर के मद्देनजर बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ के मुद्दों को भविष्य में सुनवाई के लिए खुला रख रहा है, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केंद्र सरकार तीन तलाक पर कानून बनाने को तैयार है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कोई वैक्यूम नहीं है. केंदर् ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला को रद्द करे.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तीन तलाक की तीनों फार्म यानी तलाक ए बिद्दत, तलाक ए हसना और तलाक के अहसन को रद्द कर दिया जाए को क्या होगा ? इस पर AG ने कहा  सरकार कानून लाने को तैयार है.

इससे पहले AG ने कहा - 
तलाक के मामले में मुस्लिम समाज में महिलाओं के अधिकार पुरुषों की तुलना में कम. 
देश में अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार नहीं. 
विदेशों में उम इस्लामिक देशों की महिलाओं के मुकाबले भारत में मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के अधिकार कम जहां शादी और तलाक को लेकर रिफार्म के तौर पर कानून बनाया गया. 

AG ने सुप्रीम कोर्ट में कहा -
शादी, तलाक का धर्म या धार्मिक प्रथा से कोई लेना देना नहीं.
किसी के जीवन को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है.
कोर्ट पवित्र कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब या गीता की व्याख्या करने के लिए नहीं है.

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा - 
अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, निकाह हलाला और बहूविवाह को रद्द कर देता है तो केंद्र इस पर कानून लाने को तैयार. इस मुद्दे पर कोई वैक्यूम नहीं रहेगा 

AG ने ये दलील उस वक्त दी जब कोर्ट ने पूछा कि अगर कोर्ट इसे रद्द कर देता है तो मुस्लिम पतियों के पास क्या विकल्प होगा ? 

AG ने सुप्रीम कोर्ट में कहा -
तीन तलाक संविधान के विपरीत है. 
ये महिलाओं के समानता, लैंगिक समानता और मानवाधिकार के खिलाफ है. 
कोई भी पर्सनल ला हो या प्रथा, उसे संविधान की कसौटी से गुजरना होगा.
पर्सनल ला की भी समानता के अधिकार, लैंगिक समानता के अधिकार से तुलना होनी चाहिए.
किसी भी महिला को दूसरे समुदाय की महिलाओं के समान हक होना चाहिए. 

AG ने कोर्ट में कहा
- ये माइनरटी से जुडा संवेदनशील मुद्दा है इसलिए पुरानी सरकार इस पर कानून नहीं लाई
- पुराने ग्रंथों से लिए गए पर्सनल ला भी संविधान के मुताबिक होने चाहिंए
- तीन तलाक की वजह से मुस्लिमों में आधी आबादी असहाय महसूस कर रही है
- देश में एक समुदाय के नागरिकों को  पूरे मौलिक अधिकार नहीं मिल रहे हैं.

AIMPLB की ओर से कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा...
- हर समुदाय में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है
- हिंदू लॉ के मुताबिक पिता पर होता है कि वो बेटी को जायदाद में हिस्सा दे या नहीं
- लेकिन मुस्लिम लॉ में पिता को चौथाई हिस्सा बेटी को देना ही होता है
- क्या ये भेदभाव नहीं है
- आप क्या चाहते हैं कि हिंदुओं में बेटी को बिना कोई पाई मिले वो सालों तक तलाक के लिए लड़ती रहें

सीजेआई जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, ‘‘हमारे पास जो सीमित समय है उसमें तीनों मुद्दों को निबटाना संभव नहीं है. हम उन्हें भविष्य के लिए लंबित रखेंगे.’’ अदालत ने यह बात तब कही जब केन्द्र सरकार की ओर से पेश अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि दो सदस्यीय पीठ के जिस आदेश को संविधान पीठ के समक्ष पेश किया गया है उसमें ‘तीन तलाक’ के साथ बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ के मुद्दे भी शामिल हैं.

केन्द्र की यह बात कोर्ट की इस टिप्पणी के मद्देनजर अहम है कि वह सिर्फ ‘तीन तलाक’ का मुद्दा निबटाएगा और वह भी तब जब यह इस्लाम के लिए बुनियादी मुद्दा होगा. पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर शामिल हैं.

रोहतगी ने संविधान पीठ से यह साफ करने के लिए कहा कि बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ के मुद्दे अब भी खुले हैं और कोई और पीठ भविष्य में इसे निबटाएगी.

अदालत ने स्पष्ट किया, ‘‘इन्हें भविष्य में निबटाया जाएगा.’’ उच्चतम न्यायालय मुस्लिम समाज में व्याप्त तीन तलाक को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. केन्द्र ने आज अपनी दलीलें पेश करनी शुरू की है.
 
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े सवाल उठाए थे. कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक इस्लाम में शादी खत्म करने का सबसे बुरा और अवांछनीय तरीका है.  हालांकि ट्रिपल तलाक को इस्लाम के विभिन्न स्कूल ऑफ थाट्स में इसे वैध माना गया है. ट्रिपल तलाक क्या परंपरा है या शरियत का हिस्सा है?  

क्या जो धर्म के मुताबिक ही घिनौना है वो कानून के तहत वैध ठहराया जा सकता है? जो ईश्वर की नजर में पाप है क्या उसे शरियत में लिया जा सकता है? बहुत सारे लोग देश में मौत का सजा को सिन यानी पाप मानते हैं लेकिन कानूनन ये वैध है.  अगर भारत में ट्रिपल तलाक विशिष्ट है तो दूसरे देशों ने कानून बनाकर ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया?  (पहले दिन की सुनवाई : तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट - अगर यह धर्म का मामला है तो कोर्ट इसमें दखल नहीं देगी)

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वहीं निजी तौर पर कोर्ट की मदद कर रहे पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने कहा था कि मेरी निजी राय में ट्रिपल तलाक पाप है, लेकिन  AIMPLB का स्टैंड है कि ट्रिपल तलाक घिनौना है लेकिन तब भी वैध है.

वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला  पर्सनल ला बोर्ड ने भी तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया है.


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