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मथुरा के गांव में वीरान पड़ी वाल्मीकी बस्ती, परिवारों का पलायन

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मथुरा के गांव में वीरान पड़ी वाल्मीकी बस्ती, परिवारों का पलायन

मथुरा के परखम गांव में वीरान पड़े वाल्मीकि परिवारों के घर।

मथुरा से करीब 35 किमी दूर परखम गांव में वैसे तो बड़ी चहल-पहल है, लेकिन गांव के एक कोने में दाना चुगती मुर्गियां और भूख- प्यास से बिलबिलाती कुछ गाय बंधी हैं। यहां से अंदर गली में जाते ही कुछ घर खुले पड़े दिखाई देते हैं...कहीं सामान बिखरा है। घरों के मालिक भाग गए हैं, बस थोड़ी सी आहट मिलने पर वफादार कुत्ते जरूर भौंकते मिल जाएंगे। यह परखम गांव की वाल्मीकी बस्ती है, जहां से करीब 20 से 25 वाल्मीकी परिवार 27 जुलाई को भाग गए हैं।

इस बारे में प्रशासन से पूछने पर उसका कहना है कि सोमवार तक सभी परिवार लौट आएंगे। यह लोग अपने रिश्तेदारों के यहां चले गए हैं। गांव के प्रधान प्रमोद सिंह कहते हैं कि वाल्मीकी परिवारों की जिम्मेदारी हम अकेले नहीं ले सकते हैं, जब तक प्रशासन हमारे पीछे न खड़ा हो। गांव में पीएसी तैनात है लेकिन गांव के दलितों का भरोसा अब तक नहीं लौटा है।  

दरअसल 27 जुलाई को परखम गांव में 12 साल की एक बच्ची का रेप और हत्या की वारदात हुई। रेप का आरोप इसी बस्ती में रहने वाले श्याम और सोनू वाल्मीकी पर लगा। पुलिस ने उन्हें पकड़ा और दोनों को चौकी पर ले आई। गांव के लोगों को जैसे ही इस मामले की जानकारी मिली, वह हिंसक हो गए और देखते ही देखते इस जघन्य अपराध से उपजा गुस्सा एक जाति के खिलाफ इस्तेमाल होने लगा। पुलिस की गिरफ्त से दोनों आरोपियों को छुड़ाकर गांव वाले खुद ही सजा देने पर आमादा हो गए। उन्होंने दोनों की इतनी पिटाई की कि श्याम की मौके पर ही मौत हो गई। दूसरे आरोपी सोनू का आगरा के अस्पताल में इलाज चल रहा है।


रेप की शिकार हुई बच्ची ठाकुर बिरादरी की है और आरोपी वाल्मीकी बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं। यही कारण है कि बहुसंख्यक ठाकुर बिरादरी के लोगों का गुस्सा आरोपियों के घर तक पहुंच गया।

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सवाल यह उठता है कि दूरदराज के इलाकों में कानून का राज होने के बजाए अपराधों को लेकर जातीय और धार्मिक गुटों का राज कैसे हो जाता है? इसका जवाब गांव के ही एक कोने में मौजूद परखम की पुलिस चौकी है। खंडहरनुमा इस इमारत के बोर्ड पर यदि 'पुलिस चौकी परखम' न लिखा हो तो शायद ही इसे कोई पुलिस चौकी मानने की भूल करे। 28 जुलाई को सुबह सात बजे इसी पुलिस चौकी पर दोनों आरोपी लाए गए थे। यहां न कोई लॉकअप है, न ही बिजली। दफ्तर के नाम पर एक मेज पड़ी है जिस पर जमी धूल इस बात की तस्दीक करती है कि इस चौकी का ताला खुले कितने दिन हो गए हैं।

गांव के ही सुमेर सिंह सिंह बताते हैं कि चौकी में एक दरोगा और तीन कांस्टेबल हैं, जिनके जिम्मे गांव और आसपास के करीब 50 हजार से ज्यादा लोग हैं। हालांकि चौकी पर हमला करने वाले करीब 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। जब तक इस तरह के अपराध को जातीय और धार्मिक रंग देने वालों के खिलाफ प्रशासन सख्त कार्रवाई नहीं करेगा तब तक इसी तरह सांप के चले जाने के बाद हम लकीर पीटते रहेंगे।



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