नीतीश कुमार के लिए बिहार चुनाव परिणाम में क्या चिराग पासवान 'एक्स फैक्टर' थे

एलजेपी को बड़ा फैक्टर माना जाता है. पार्टी ने जेडीयू के खिलाफ हर सीट पर उम्मीदवार उतारे और नीतीश कुमार की पार्टी के वोटबैंक में सेंध लगाई

नीतीश कुमार के लिए बिहार चुनाव परिणाम में क्या चिराग पासवान 'एक्स फैक्टर' थे

चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी चुनाव में एक सीट ही जीत पाई, लेकिन छह फीसदी वोट पाए (फाइल)

जेडीयू के खराब प्रदर्शन के बावजूद नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर छठवीं बार लौटने को तैयार दिख रहे हैं. जेडीयू को 2015 को 71 सीटें मिली थीं और 43 सीटें इस बार मिल पाई हैं. चिराग पासवान की अगुवाई वालीएलजेपी को इसके पीछे बड़ा फैक्टर माना जाता है.पार्टी ने जेडीयू के खिलाफ हर सीट पर उम्मीदवार उतारे और नीतीश कुमार की पार्टी के वोटबैंक में सेंध लगाई. चिराग पासवान और उनकी पार्टी एलजेपी ने उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया.

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एलजेपी को एकमात्र मैथानी सीट पर महज 333 सीटों से जीत मिली. उन्होंने जेडीयू के नरेंद्र सिंह को हराया. हालांकि एलजेपी को चुनाव में 5.66 फीसदी वोट मिले. एनडीए में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उबरी 19.46 फीसदी वोट मिले. जबकि जेडीयू को 15.39 फीसदी वोट हासिल हुए.माहनर सीट से जेडीयू के उमेश कुशवाहा राजद प्रत्याशी के हाथों महज 8 हजार से कम वोटों से हार गए. यहां लोजपा के रबींद्र कुमार सिंह एक्स फैक्टर रहे, जिन्हें 31,256 वोट हासिल हुए.

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सिंह का कहना है कि अगर एनडीए ने एक साथ चुनाव लड़ा होता तो 200 से ज्यादा सीटें मिली होतीं. लेकिन एलजेपी फैक्टर के कारण जेडीयू को बड़ा नुकसान पहुंचा. यही चिराग पासवान का मकसद था. सिंह ने कहा, जेडीयू को चोट पहुंचाने के लिए एलजेपी के पास कोई रणनीति नहीं थी, लोग पहले से ही उनसे ऊब चुके थे. एलजेपी की अपनी अलग चुनावी रणनीति 'बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट की थी."

हालांकि कुशवाहा को इसमें साजिश की बू आती है. कुशवाहा ने कहा, "हमने एनडीए को लेकर वोटों का जो हिसाब लगाया था, वो नहीं मिला. यह वोट एलजेपी और राजद को ट्रांसफर हो गया. अगर मुझे पूरा एनडीए का वोट मिला होता तो जीत जाता. भाजपा का वोट मेरी ओर ट्रांसफर नहीं हुआ. मैं क्या कह सकता हूं. "जातीय समीकरणों और भावनाओं को जिक्र करते हुए कुशवाहा का कहना है कि एलजेपी को उससे कहीं ज्यादा वोट मिले, जितने उसे मिलने चाहिए थे. मेरा वोट उनका ट्रांसफर हो गया.


माहनर सीट के तहत आने वाले मुकुंदपुर भाट गांव के हिसाब से देखें कि कैसे लोजपा-जेडीयू समीकरणों ने जमीनी स्तर पर असर डाला. ठाकुर समुदाय के सदस्य अशोक कुमार ने 2015 में जेडीयू को वोट दिया था. इस बार उन्होंने एलजेपी के प्रत्याशी को वोट दिया, जो उन्हीं की जाति के थे. यह बताता है कि कैसे एलजेपी ने चतुराई से रणनीति तैयार की और उसे एनडीए के वोट में सेंध लगाई.

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भाजपा ने एलजेपी के साथ चुनाव पूर्व किसी गुपचुप डील से इनकार किया है. इस डील को नीतीश कुमार के एनडीए में प्रभाव कम करने की रणनीति माना गया था. मुख्यमंत्री के लचर प्रदर्शन से भी यह अफवाह उड़ी कि उन्हें बदला जा सकता है, क्योंकि बीजेपी अपने नई ताकत का इस्तेमाल करते हुए दिख रही है. भाजपा ने अभी तक इससे इनकार किया है, लेकिन रविवार को विधायक दल की बैठक से संकेत मिलेंगे कि बीजेपी-जेडीयू के आगे के रिश्ते कैसे आगे काम करेंगे.