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युद्ध या शांति : क्या कहना है आम लोगों से लेकर सैनिकों के परिवार वालों का

ऐसे कई सैनिक परिवारों के सदस्य सामने आ रहे हैं जो युद्ध के खिलाफ हैं. जिस आसानी से यह कह दिया जाता है कि सैनिक बने हो तो युद्ध करना पड़ेगा, यह गलत है.

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नई दिल्‍ली:

आजकल न्यूज़ चैनलों पर युद्ध को लेकर जंग छिड़ी हुई है, सरकार से ज्यादा न्यूज़ चैनलों के एंकर और एक्सपर्ट युद्ध को लेकर ज्यादा गंभीर हैं. चर्चा के दौरान भारत और पाकिस्तान के एक्सपर्ट के बीच गर्मागर्म बहस किसी युद्ध से कम नहीं है. जरा सोचिए आजकल बहस का स्तर कितना गिर गया है. युद्ध जैसे गंभीर विषय पर जहां न्यूज़ एंकरों को संयम से काम लेना चाहिए, वो आग में घी डालने में लगे हुए हैं. न्यूज़ चैनलों की भाषा बदल गई है, ऐसी भाषा ही लोगों के अंदर उन्माद पैदा कर रही है. लेकिन क्या सच में आम आदमी युद्ध चाहता है? जो सैनिक बॉर्डर पर देश की रक्षा कर रहा है वो युद्ध चाहता है? सैनिक के परिवार के लोग युद्ध चाहते हैं? शायद नहीं. ऐसे कई सैनिक परिवारों के सदस्य सामने आ रहे हैं जो युद्ध के खिलाफ हैं. जिस आसानी से यह कह दिया जाता है कि सैनिक बने हो तो युद्ध करना पड़ेगा, यह गलत है. डिफेंस में ज्‍वाइन करने का मतलब सिर्फ युद्ध नहीं होता है. युद्ध के दौरान जब किसी सैनिक की मौत हो जाती है, उसके परिवार के ऊपर क्या असर होता है वो सिर्फ परिवार ही जनता है.

युद्ध को लेकर क्या कहना है आर्मी अफ़सर की पत्नी का
सिसिलिया अब्राहम एक सैनिक की पत्नी हैं. सिसिलिया के पति आर्मी में काम करने के बाद रिटायर हुए हैं. सिसिलिया मानती हैं कि युद्ध नहीं होना चाहिए और युद्ध किसी चीज का समाधान नहीं है. सिसिलिया का कहना है एक सैनिक की बहुत सारी भूमिकाएं हैं. सिर्फ यह कह देना की आर्मी में जाने का मतलब सिर्फ युद्ध है यह गलत है. सिसिलिया का कहना है कि कई ऐसी विधवाओं से वो मिलती हैं जिनके पति युद्ध में शहीद हो चुके हैं. पति के जाने के बाद ज़िंदगी पटरी पर नहीं उतर पाती है. सिसिलिया का कहना है कि ज्यादातर सिपाहियों की पत्नियां गांव से आती हैं, कई पत्नियां अनपढ़ होती हैं, लिखना नहीं आता है, घूंघट में रहती हैं, ऐसे लोगों को मदद लेने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है. शुरुआत में सरकार कुछ मदद कर देती है लेकिन ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है. सिसिलिया कहना है कि युद्ध से आप विधवा बनवा रहे हो, युद्ध से लोग बेघर हो जाते हैं. सिसिलिया यह भी मानती हैं कि युद्ध के पक्ष में वो लोग हैं जो आर्मी की ज़िंदगी के बारे में नहीं जानते हैं. पहले आर्मी वालों को पूछा जाए, उनके घर वालों को पूछा जाए कि युद्ध उन्हें पसंद है या नहीं? ज्यादातर कहेंगे युद्ध नहीं होना चाहिए. आर्मी ज्‍वाइन करने का मतलब सिर्फ युद्ध नहीं होता है, युद्ध एक पार्ट है लेकिन युद्ध सब कुछ नहीं है. सिसिलिया उन विधवाओं से भी मिलती हैं जो 1965 युद्ध में विधवा हो चुकी हैं, इतने सालों तक विधवा के रूप में रहना किसी महिला के लिए आसान नहीं है.


युद्ध को लेकर क्या कहना है शहीद हुए सैनिक की बेटी का
मेजर सीबी द्विवेदी 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे. शहीद होने के बाद उनके परिवार के लिए सब कुछ आसान नहीं रहा है. द्विवेदी की बेटी दीक्षा द्विवेदी ने क्विंट से बात करते हुए कहा कि जब युद्ध होता है तो सिर्फ सैनिक का परिवार ही जानता है उनके ऊपर क्या गुजरती है. दीक्षा का कहना है कि अपने पापा को खोना सिर्फ युद्ध नहीं था, पापा की मौत के बाद अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाना ही असली युद्ध था. इसके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा. दीक्षा का कहना है कि जब भी युद्ध की बात होती है वो खुद और उनकी बहन रोने लगती हैं क्योंकि उन्हें लगता है किसी और परिवार को वो स्थिति झेलनी पड़ेगी जो वो खुद 1999 में झेल चुकी हैं.

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युद्ध को लेकर क्या है एक ऑटो ड्राइवर की सोच
युद्ध चाहिए या शांति यह जानने के लिए गुरुवार को एनडीटीवी ने कई आम लोगों से बात की जिसमें ऑटो ड्राइवर, ओला ड्राइवर, सब्जी बेचने वाले, छात्र, प्रेस करने वाले कई आम लोग शामिल थे. एनडीटीवी से बात करते हुए एक ऑटो ड्राइवर ने कहा कि युद्ध नहीं बल्कि शांति के जरिये भारत और पाकिस्तान के बीच जो तनाव है वो दूर होना चाहिए. जब हमने पूछा कि युद्ध से क्या नुकसान होगा तो ऑटो ड्राइवर का कहना था कि युद्ध से देश की तरक्की रुक जाएगी, आर्थिक स्थिति खराब होगी जिसका असर आम लोगों के ऊपर ज्यादा होगा. युद्ध से लोगों की तनख्‍वाह भी रुक सकती है. अगर ऐसा होगा तो लोग ऑटो में जाना भी बंद कर देंगे. युद्ध को लेकर टीवी चैनलों पर हो रही बहस पर जब हमने सवाल पूछा तो ऑटो ड्राइवर का कहना था कि सिर्फ अपने फायदे के लिए ये लोग ऐसा करते रहते हैं. नेता सिर्फ अपना फायदा देखते हैं. ऐसे लोगों को दिल से देश के लिए सोचना चाहिए.

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युद्ध और मीडिया के लिए क्या है एक ओला ड्राइवर का संदेश
ओला चला रहे तुलसी ने कहा कि शांति से बातों का समाधान होना चाहिए, अगर शांति से नहीं हो पाता है तो फिर युद्ध के बारे में सोचना चाहिए. ओला ड्राइवर का मानना है कि युद्ध से सैनिक मरता है, आम आदमी मरता है, इससे कोई फायदा नहीं होता है. युद्ध से जिस परिवार का कोई मरता है तो उस परिवार की क्या स्थिति होती है वो सिर्फ वह परिवार ही जनता है. न्यूज़ चैनलों में हो रही बहस के बारे में ओला ड्राइवर ने कहा कि ऐसे बहस से वो खुश नहीं है. न्यूज़ चैनलों को संदेश देते हुए ओला ड्राइवर ने कहा कि न्यूज़ चैनल वालों को यह दिखाना चाहिए कि शांति में सब कुछ है, झगड़े में कुछ नहीं है, युद्ध से दोनों तरफ बर्बादी होगी. न्यूज़ चैनल में हो रहे हिन्दू मुस्लिम डिबेट पर ओला ड्राइवर का कहना है कि सब को मिलजुलकर रहना चाहिए, भाई-भाई की तरह रहना चाहिए. सब इंसान हैं, भगवान के द्वारा बनाई हुई एक चीज हैं. यहां आकर अलग अलग कैसे हो जाते हैं. लोगों को खुद अपनी ज़िंदगी जीनी चाहिए और दूसरों को भी जीने देना चाहिए.

हम ऐसे और लोगों से भी मिले जिनका कहना है कि युद्ध नहीं शांति के जरिये तनाव का हल निकालना चाहिए. कपड़े प्रेस करने वाले दिनेश ने कहा कि शांति से आगे बढ़ना चाहिए. सब्जी वाले से लेकर फल बेचने वालों का भी मानना है कि युद्ध से नहीं बातचीत से समस्या का समाधान होना चाहिए. जब एक आम आदमी युद्ध नहीं शांति चाहता है तो फिर पढ़े लिखे लोग और एंकर युद्ध के लिए कैसे बल्लेबाजी कर रहे हैं.



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