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आखिर अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों का मक़सद क्या? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

अल्पसंख्यक की जब भी बात होती है मुसलमानों की ही तस्वीर सामने आती है. जबकि मुसलमानों के अलावा ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी और जैन कुल छह समुदायों को अल्पसंख्य का दर्जा दिया गया है.

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आखिर अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों का मक़सद क्या? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

खास बातें

  1. भारत की आबादी में अल्पसंख्यकों का हिस्सा 19 फीसदी
  2. अल्पसंख्यकों में सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई भी शामिल
  3. अन्य समुदाय अल्पसंख्यक मंत्रालय का हिस्सा नहीं बनते
नई दिल्ली: अल्पसंख्यक की जब भी बात होती है मुसलमानों की ही तस्वीर सामने आती है. जबकि मुसलमानों के अलावा ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी और जैन कुल छह समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है. हम कभी सिखों की नज़र से, जैन समाज की नज़र से या बौद्ध समाज की नज़र से अल्पसंख्यक मंत्रालय को देखते ही नहीं हैं या दिखता भी नहीं है. एक कारण यह हो सकता है कि भारत की आबादी में अल्पसंख्यकों का हिस्सा 19 फीसदी है और इसमें सबसे बड़ा समूह मुसलमानों का ही है. यह भी हो सकता है कि आप केंद्र से लेकर राज्यों तक के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रियों के नाम देखेंगे तो ज़्यादातर मुसलमान ही होंगे.

केंद्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक मामलों के सभी मंत्री एक ही समुदाय से आते हैं. यानी अल्पसंख्यक मंत्रालय में भी दबदबा उसका है जो अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यक हैं. अच्छा होता कि इस मंत्रालय का भार सिख समुदाय, जैन समुदाय या पारसी या बौद्ध समाज के सांसदों को भी मिलता.

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जब छह अल्पसंख्यक समुदाय हैं तो एक ही समुदाय का मंत्री हर बार क्यों बनता है. क्या इस वजह से 14 फीसदी आबादी के साथ मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है, तो फिर करीब तीन करोड़ की आबादी वाले ईसाई, दो करोड़ की आबादी वाले सिख समुदाय के सांसदों को इन मंत्रालयों में मंत्री बनने का मौका क्यों नहीं मिलता है. इससे दूसरे अल्पसंख्यकों के प्रति विश्वास बढ़ेगा और अल्पसंख्यक की बहस में दूसरे समुदाय के चेहरे भी आ सकेंगे.

 2006 में यह मंत्रालय बना है उससे पहले यह सोशल जस्टिस मंत्रालय का हिस्सा होता था. कभी यह विभाग के रूप में गृहमंत्रालय का हिस्सा हुआ करता था.  आज भी कई राज्यों में है. जैसे गुजरात में अल्पसंख्यक मामलों का अलग से मंत्री नहीं है. सामाजिक कल्याण व आधिकारिता मंत्रालय है जिसके मंत्री हैं आत्माराम परमार. कई राज्यों में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय नहीं है बल्कि विभाग है. कर्नाटक, केरल यूपी और बिहार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुसलमान हैं लेकिन कई राज्यों में ऐसा नहीं है.

केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों की वेबसाइट से काफी कुछ पता चलता है. यही कि इस मंत्रालय के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों के 118 पद स्वीकृत हैं और इतने कम क्षमता के बाद भी 42 पद ख़ाली हैं. इस मंत्रालय का बजट मात्र 3777 करोड़ ही है. 19 फीसदी आबादी के कल्याण के लिए ये बजट काफी है यह सवाल उनके लिए है जो अल्पसंख्यक मंत्रालय को देखती बड़ी भारी तुष्टीकरण देखने लगते हैं. जबकि ऐसा नहीं है.

आंकड़े से पता चलता है कि केंदीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी कई समुदायों की ज़िम्मेदारी संभालते हैं. ये ज़रूर है कि मंत्रालय की वेबसाइट सिर्फ दो भाषाओं में है. हिन्दी और अंग्रेज़ी में. कायदे से गुरमुखी में तो हो ही सकती थी. वैसे उर्दू में प्रेस रिलीज़ हो सकती है. जिस तरह अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय का नाम आते ही उसे मुस्लिम समुदाय के तुष्टीकरण के चश्मे से देखा जाने लगता है उसी तरह इनके शिक्षण संस्थानों का नाम लेते ही हम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिलिया ही देखने लगते हैं. जबकि हम भूल जाते हैं कि इस देश में अलग-अलग समुदायों के और भाषाओं के आधार पर भी 13 हज़ार से अधिक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं. पंजाब में ही जैन समाज के, आर्यसमाज के और सिख समाज के अल्पसंख्यक संस्थान हैं, कालेज हैं.

इसी तरह से जैन और ईसाई समाज के भी बड़े बड़े कालेज हैं. इन संस्थानों में भी वही नियम हैं जो जामिया या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए हैं. नेशनल कमिशन फार माइनारिटिज़ एजुकेशनल इंस्टीट्युशन्स के पहले चेयरमैन जस्टिस सुहैल सिद्दीकी ने कहा कि उनकी नज़र में पूरे देश में मुसलमानों के लिए यही दो क़ाबिल यूनिवर्सिटी हैं. कुछ और होंगी लेकिन नाम भर की हैं. पता नहीं क्यों बार-बार ये संस्थाएं विवादों के घेरे में आ जाती हैं. अगर सरकार को दिक्कत है तो दो नहीं दस कालेज यूनिवर्सिटी खोल दें. बार बार ए एम यू और जामिया मिल्लिया को लेकर ये विवाद क्यों पैदा किया जाता है जैसे इनके अल्पसंख्यक होने से बड़ा भारी नुकसान हो रहा है, तुष्टीकरण हो रहा है, हाल ही में कुछ जगहों पर छपा कि सरकार जामिया मिल्लिया से अल्पसंख्यक का दर्जा वापस लेने जा रही है, जबकि सरकार ने अपनी तरफ से कुछ भी ऐसा नहीं कहा है, इससे पहले 2016 में भी ऐसी खबरें छपी थीं और इस बार भी,

7 अगस्त को इंडियन एक्सप्रेस की रितिका चोपड़ा की खबर छपी कि केंद्र सरकार कोर्ट से अपना हलफनामा वापस लेने जा रही है, एक्सप्रेस को यह जानकारी सूत्रों से पता चली है, यहां यह सावधानी बरतनी होगी कि मंत्री ने औपचारिक रूप से ऐलान नहीं किया है. रितिका चोपड़ा ने लिखा है कि मानव संसाधन मंत्रालय दिल्ली हाईकोर्ट में अपना नया पक्ष रखेगी, मंत्रालय अदालत से कहने जा रहा है कि जामिया मिलिया इस्लामिया कभी अल्पसंख्यक संस्थान था ही नहीं क्योंकि इसे संसद के एक्ट से कायम किया गया है, केंद्र सरकार इसे फंड करती है, 15 जनवरी 2016 के इंडियन एक्सप्रेस में ही खबर छपी थी कि भारत सरकार के महाधिवक्ता ने तत्कालीन मंत्री को सलाह दी है कि वो अपना राय बदल सकती हैं यानी जामिया अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है,

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क्या यह कहीं लिखा है कि अगर केंद्र से फंड लिया जाएगा तो वह संस्थान माइनारिटी नहीं रहेगा, दूसरा हमें यह समझना होगा कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान कायम करने के पीछे मकसद क्या होता है और कौन लोग होते हैं, अगर वन नेशन वन टैक्स वाले देश में माइनारिटी संस्थान खत्म करने की दलील व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी में चलाई जा रही है तो क्या उन्हें पता है कि यही दलील जैन, बौद्ध सिख संस्थानों पर भी लागू होगी, बेहतर है कि हम संविधान में माइनारिटी की परिभाषा. उनके कल्याण के हुए बनाने जाने वाले संस्थानों की स्थिति को ठीक से समझ लें, बात सिर्फ जामिया की नहीं है बात है कई हज़ार माइनारिटी संस्थानों की.

 


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