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...जब एक वोट से गिर गई थी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार

17 अप्रैल 1999 को लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पर जब वोटिंग हुई तब सरकार एक ही वोट से हार गई और इस तरह सरकार गिर गई.

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...जब एक वोट से गिर गई थी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार

अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

इस बार संसद के मॉनसून सत्र में विपक्ष द्वारा लाए गये अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा जोरों पर रही और मोदी सरकार काफी आसानी से विश्वास मत हासिल करने में कामयाब रही. मगर एक वक्त ऐसा भी था, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार को सदन में बहुमत साबित करना पड़ा था और इस अग्नि परीक्षा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार विफल साबित हुई थी और महज एक वोट से उनकी सरकार गिर गई थी. बात दरअसल, 1999 में की है, जब तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपनी पार्टी को एनडीए से अलग कर लिया था और वाजपेयी सरकार विश्वास मत साबित करने के लिए मजबूर हो गई थी.

दरअसल, 1998 के आम चुनाव में किसी भी पार्टी को पूरी तरह बहुमत नहीं मिला था मगर, AIADMK के समर्थन से एनडीए ने केंद्र में सरकार बनाई थी. करीब 13 महीने बाद अप्रैल, 1999 में दिवंगत नेता जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था, और सरकार अल्पमत में आ गई. इसके बाद फिर राष्ट्रपति ने सरकार को अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा. जिसके बाद वाजपेयी सरकार को विश्वास प्रस्ताव रखना पड़ा. इसके बाद से संसद के गलियारों में गहमागहमी शुरू हो गई थी. 

17 अप्रैल 1999 को लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पर जब वोटिंग हुई तब सरकार एक ही वोट से हार गई और इस तरह सरकार गिर गई. ऐसा कहा जाता है कि उस वक्त ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गमांग ने सरकार के खिलाफ वोट दिया था. वो ठीक दो महीनों पहले यानी 18 फ़रवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे, मगर उन्होंने लोकसभा से इस्तीफ़ा नहीं दिया था. वो कोरापुट संसदीय क्षेत्र की नुमांइदगी कर रहे थे.


हालांकि, सांसद के पद से उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया था. सांसद के रूप में गमांग वोट देने पहुंचे और कांग्रेस के सदस्य होने के नाते सरकार के खिलाफ वोट दिया. उस वक्त किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि सरकार एक ही वोट से गिर जाएगी और जब ऐसा हो गया तो गमांग सुर्खियों में आ गए. मुख्यमंत्री रहते हुए वोट देने के लिए पहुंचने पर उनकी आलोचना हुई. हालांकि, इस पर अभी भी बहस होती है. शुरू में ऐसी खबरें आईं थीं कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगी, मगर आखिरी वक्त पर मायावती ने सदन में जाकर सरकार के खिलाफ वोट दिया.
  
ऐसा कहा जाता है कि सिर्फ गमांग ही नहीं, बल्कि मायावती और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज ने भी सरकार के खिलाफ फोट किया था. इस तरह से विश्वास मत के पक्ष और खिलाफ में वोट पड़ने के बाद लोकसभा स्पीकर ने एलान किया कि विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 269 और विरोध में 270 वोट पड़े. इस तरह से तेरह महीने की पुरानी वाजपेयी सरकार महज एक वोट गिर चुकी गई. 

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लोकसभा स्पीकर के इस ऐलान के बाद कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. कई सांसदों ने मायावती, गमांग और सोज का गर्मजोशी से शुक्रिया अदा किया. कांग्रेसी सांसद इनसे हाथ मिलाने लगे और वाजपेयी सरकार की गिरने की खुशी मनाने लगे. मगर अटल बिहारी वाजपेयी ने हाथ सिर से लगा कर सलाम कर सदन का फैसला माना.

मगर समय का पहिया फिर से घुमा, अगले चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला और फिर अगले पांच साल तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे. हालांकि, इसके बाद कई बार गमांग ने यह बातें कही कि उनकी वजह से वाजपेयी की सरकार नहीं गिरी थी. अभी तक यह बहस का विषय है कि अटल बिहारी वाजयेपी की सरकार गिराने में सबसे अहम भूमिका गमांग या मायावती या फिर सैफुद्दीन सोज के वोट ने निभाई. 



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