जब लालू यादव को गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई सेना की मदद मांगने पहुंची, पढ़ें- पूरा किस्सा

बुधवार को दिल्ली में जब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को गिरफ़्तार करने के लिए CBI के कुछ अधिकारी उनके बंगले की दीवार फांदकर घर में घुसे तो बहुत लोगों को इस पर आश्चर्य हुअा.

जब लालू यादव को गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई सेना की मदद मांगने पहुंची, पढ़ें- पूरा किस्सा

लालू यादव (फाइल फोटो)

पटना:

बुधवार को दिल्ली में जब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को गिरफ़्तार करने के लिए CBI के कुछ अधिकारी उनके बंगले की दीवार फांदकर घर में घुसे तो बहुत लोगों को इस पर आश्चर्य हुअा. मीडिया के एक वर्ग ने उसे ऐसे पेश किया कि जैसे इससे पहले जांच एजेन्सी ने कभी ऐसी तत्परता नहीं दिखाई थी. लेकिन सीबीआई के कई अधिकारियों को, ख़ासकर जो एजेंसी में 5 दशक या उससे ज्यादा का वक्त गुजार चुके हैं, उन्हें चारा घोटाले में लालू यादव की गिरफ़्तारी का वाकया जरूर याद होगा. उस वक्त एजेंसी को सेना की मदद मांगनी पड़ी थी. चारा घोटाला 1996 जनवरी महीने के अंतिम सप्ताह में उजागर हुआ था और पहले ही दिन से ये चर्चा जोरों पर थी कि इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव की संलिप्तता है. क्योंकि चारा घोटाले में शामिल कई ऐसे अधिकारी थे, जिनकी सीएम से नज़दीकी जगजाहिर थी. ये बात भी किसी से छिपी नहीं थी कि उनकी विशेष कृपा एक से अधिक अधिकारियों पर थी.  

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इस मामले की जांच के बाद उस समय के सबसे बड़े मामले जो चाईबासा कोषागार से सम्बंधित था, उसमें लालू यादव 1997 के जून महीने में चार्जशीटेड हुए और मुख्यमंत्री पद से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था. लेकिन उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी राबड़ी देवी को शपथ दिला दी. जिससे सत्ता की कमान उनके और उनके परिवार के पास ही रहे. इस बीच CBI जांच की कमान संभाल रहे उस समय के ज्वाइंट डायरेक्टर उपेन बिश्वास ने लालू यादव को गिरफ़्तार करने का मन बना लिया. कोर्ट से वारंट भी हासिल कर लिया, लेकिन उन्हें सरकार से इस वारंट को तामील कराने के लिए जो सहयोग चाहिए था वो नहीं मिल रहा था. जब उन्होंने पुलिस फ़ोर्स मांगी तो कुछ सिपाई भेज दिए गए. इससे क्षुब्ध होकर बिश्वास ने 29 जुलाई की रात उस समय के राज्य के पुलिस महानिदेशक एसके सक्सेना और मुख्य सचिव से मुलाकात की, लेकिन बात नहीं बनी. दूसरी ओर, लालू यादव के मुख्यमंत्री आवास के अंदर और बाहर हज़ारों की संख्या में उनके समर्थकों का जमावड़ा लगा रहा.  

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इसके बावजूद उपेन बिश्वास ने हार नहीं मानी. आवेश में अपने एसपी वी एस के कोमुदी को CBI की स्टैंडिंग काउंसिल राकेश कुमार के साथ उस मामले की मॉनिटरिंग कर रहे पटना उच्च न्यायालय में दो जजों की बेंच से अवगत करा निर्देश लेने का आदेश दिया. इस बीच लालू यादव, जो कुछ महीने पहले जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बना चुके थे. तब केंद्र सरकार पर उनका दबाव इस बात को लेकर था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री आईके गुजराल उनकी पसंद से प्रधान मंत्री बने थे और वो बिहार से राज्य सभा में गये थे. इसकी वजह से केंद्र सरकार और CBI के दिल्ली में कुछ अधिकारी चाहते थे कि लालू यादव को CBI की विशेष अदालत में आत्मसमर्पण करने का एक मौक़ा मिलना चाहिए और उनकी गिरफ़्तारी न हो.  लेकिन विश्वास भी अपनी ज़िद पर अड़े थे और उन्होंने सुबह सुबह कोमुदी और राकेश कुमार को दानापुर कैंट में ब्रिगेडियर RP नौटियाल से मिलने का आदेश दिया और कहा कि सेना को की मदद से लालू यादव की गिरफ़्तारी की जाए, लेकिन ब्रिगेडियर नौटियाल ने अपने ऊपर के अधिकारियों से बातचीत के बाद यह कहकर अपने हाथ खड़े कर दिए कि सेना का काम मुश्किल के समय में सिविल प्रशासन की मदद करना है ना कि पुलिस के बदले किसी काम में भाग लेना. 

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गौरतलब है कि बाद में जांच के दौरान नौटियाल ने माना कि उन्होंने मॉनिटरिंग कर रहे एक जज से फ़ोन कर पूछा था कि क्या उन्होंने ऐसे आदेश दिए हैं तो उन्होंने इनकार कर दिया. जबकि बिश्वास और उनके अधिकारियों का कहना था कि मॉनिटरिंग बेंच का ये लिखित नहीं मौखिक आदेश है. आखिरकार विश्वास को सेना की मदद नहीं मिली और लालू यादव ने अपनी मर्ज़ी के अनुसार 30 जुलाई को सीबीआई कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और कोर्ट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. चूंकि सरकार उनकी थी इसलिए उनके आराम का ख़याल रखते हुए बीएमपी के गेस्ट हाउस को विशेष जेल बनाया गया. जहां से लालू यादव सरकार भी चला रहे थे. लेकिन इस मामले पर ख़ासकर सेना बुलाने की बात जैसे ही मीडिया में लीक हुई उस समय लोक सभा का सत्र चल रहा था और इस मुद्दे पर जमकर हंगामा शुरू हो गया.  

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तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने घोषणा की कि एक विशेष जांच बैठाी जा रही हैं जो दस दिन में अपनी रिपोर्ट देगी. लेकिन वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उस समय लोकसभा में बिश्वास के इस क़दम का ये कहकर समर्थन किया कि पटना में विधि व्यवस्था चरमरा गई थी इसलिए उनका क़दम सही है. इस जांच का ज़िम्मा आरपीएफ़ के डीजी ए पी दूरई को दिया गया, जिन्होंने 17 दिन में अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट दी और बिश्वास के सेना की मदद मांगने के क़दम को ग़लत ठहराते हुए उनके अलावा एसपी कौमुदी पर भी कार्रवाई की अनुशंसा की. लेकिन कुछ महीने में गुजराल सरकार गिर गयी और बिश्वास अपने ख़िलाफ़ जांच और जो भी आदेश पारित हुआ, उसके खिलाफ कोलकाता हाईकोर्ट गये. जिसने उनके पक्ष में फ़ैसला देते हुए सारी कार्रवाई को ख़ारिज कर दिया. इस घटना के बाद से राजनीतिक अभियुक्तों के मामले में अब सीबीआई अधिकारी फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं. 

 
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