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राम रहीम जैसे लोगों को ताक़तवर बनाने में किसका हाथ है? राजनेताओं का, भक्तों का या फिर...

यह उस खत के कुछ अंश है जो 2002 में डेरा सच्चा सौदा में काम कर रही एक साध्‍वी ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को लिखा था.

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राम रहीम जैसे लोगों को ताक़तवर बनाने में किसका हाथ है? राजनेताओं का, भक्तों का या फिर...

गुरमीत राम रहीम सिंह (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. गुरमीत राम रहीम को यौन शोषण के मामले में दोषी ठहराया गया
  2. 28 अगस्‍त को सजा सुनाई जाएगी
  3. कोर्ट के फैसले के बाद हिंसा भड़क उठी
नई दिल्‍ली:

'मैं पंजाब की रहने वाली हूं और पांच साल से डेरा सच्चा सौदा सिरसा, हरियाणा में साध्‍वी के रूप में सेवा कर रही हूं. मेरे साथ यहां सैकड़ों लड़कियां भी 18-18 घंटे सेवा करती है. हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है. साथ में डेरे के महाराज गुरमीत सिंह द्वारा यौन शोषण किया जा रहा है. मेरे परिवार के सदस्य महाराज के अंध भक्त श्रद्धालु है, जिनकी प्रेरणा के डर से मैं साध्‍वी बनी थी.' यह उस खत के कुछ अंश है जो 2002 में डेरा सच्चा सौदा में काम कर रही एक साध्‍वी ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को लिखा था. इस खत से अनुमान लगाया जा सकता है कि बाबा राम रहीम कैसे महिलायों का शारीरिक शोषण करता था, बात न मानने पर परिवारों के लोगों का मर्डर करने की धमकी देता था. उस वक्त़ अगर इस साध्वी ने बाबा के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई होती तो आज भी राम रहीम भक्तों के सामने भगवान बनकर रहता.

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15 साल तक इस केस को कोर्ट में लड़ना कोई आसान बात नहीं है. इस दौरान साध्‍वी को जान से मार देने की धमकी दी जा रही थी लेकिन इस सब की परवाह न करते हुए इस साध्वी ने केस लड़ा और राम रहीम को जेल पहुंचाने में कामयाब रही. सिर्फ साध्वी नहीं आज उस उस पत्रकार के परिवार की मेहनत भी रंग लाई है जो 15 सालों से बाबा के खिलाफ केस लड़ रहा है.

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जब बड़े से बड़े अखबार बाबा के खिलाफ लिखने के लिए डरते थे तब सिरसा के लोकल अखबार 'पूरा सच' के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने बाबा के खिलाफ साध्वी के द्वारा लिखे गए खत को अपने अखबार के पहले पन्ने पर जगह दी थी लेकिन कुछ महीनों के अंदर राम चंद्र को गोली मारी गई. 28 दिन तक अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ने के बाद राम चंद्र की मौत हो गई. मरने से पहले रामचंद्र छत्रपति ने अपने स्टेटमेंट में राम रहीम का नाम लिया था लेकिन लोकल पुलिस ने एफआईआर में राम रहीम का नाम हटा दिया. पत्रकार का परिवार मदद के लिए भटकता रहा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. फिर हाई कोर्ट में अपील के बाद इस केस को सीबीआई को हस्तांतरित कर दिया गया.

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दस साल तक इस केस के बारे में छानबीन करने के बाद 2014 में सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी थी. सबसे अच्छी बात यह है कि सीबीआई किसी के दवाब में नहीं आई और सही रिपोर्ट कोर्ट में पेश की. हाई कोर्ट की भी जितनी तारीफ की जाए कम है. अगर हाई कोर्ट ने इस केस की छानबीन के लिए ऑर्डर नहीं दिया होता तो यह केस किसी दूसरे केस की तरह फ़ाइल में दब कर रह जाता.

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इस केस से सिर्फ राम रहीम जैसे बाबा पर नहीं कई कई दूसरों पर भी सवाल उठता है. सबसे पहले सवाल उन अंध भक्तों के ऊपर जो ऐसे बाबा की भक्ति में अंधे हो जाते हैं. साध्वी ने अपने खत में लिखा है कि कैसे उसके परिवार के लोग बाबा को भगवान मानते थे और बाबा की सेवा करने के लिए डेरा सच्चा भेज दिए जाते थे. राम रहीम के खिलाफ रेप केस के बारे में जानने के बाद भी लाखों संख्या में भक्तों का बाबा के दर्शन के लिए सड़क के किनारे इंतज़ार करना अंध भक्ति का एक और नमूना है.

बाबा राम रहीम को ताक़तवर बनाने में राजनेताओं का भी हाथ है. कई बड़े-बड़े राजनेता राम रहीम के भक्त हैं. कोई सर झुका के प्रणाम करता है तो कोई जन्मदिन पर बाबा के लिए गिफ्ट लेकर जाता है. इन सब के पीछे वोट बैंक की राजनीति है. बाबा को खुश करने का मतलब है बाबा के भक्तों को खुश करना और चुनाव के दौरान भक्तों के वोट हासिल करना.

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा में हुई हिंसा को लेकर चिंतित नज़र आते हैं तो दूसरी तरफ साक्षी महाराज यह बयान देते हैं कि राम रहीम के खिलाफ सिर्फ एक महिला ने आरोप लगाया है और उनके करोड़ भक्त हैं और यह सिर्फ राम रहीम नहीं भारतीय संस्कृति के खिलाफ षडयंत्र है. अलग अलग मुद्दों पर रोज एक दूसरे से लड़ने वाले पार्टियों की प्रवक्ता भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं.

राजनेताओं के साथ ही मीडिया के ऊपर भी सवाल उठता है. सिर्फ रामचंद्र छत्रपति क्यों, क्या दूसरे मीडिया हाउस ने भी साध्वी के द्वारा लिखे गए पत्र को अपने अखबारों के पन्ने पर जगह दी थी. शायद नहीं या फिर अगर जगह दी भी होगी तो वो बहुत कम. अगर मीडिया ने इस मामले को शुरुआत से ही गंभीरता से लिया होता तो साध्वी और रामचंद्र छत्रपति के परिवार के सदस्यों को किसी का साथ होने का अहसास जरूर होता. लेकिन पिछले कुछ दिनों से मीडिया ने इस केस की जिस तरह लाइव कवरेज किया वो तारीफ के काबिल है. पत्रकारों ने अपने जहां की परवाह न करते हुए इस खबर को लोगों के पास पहुंचाया.

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VIDEO: गुरमीत राम रहीम दोषी करार

राम रहीम को दोषी करार दिए जाने के बाद उनके समर्थकों ने सबसे पहले मीडिया पर हमला बोला. मीडिया की गाड़ियों को जला दिया गया जिसकी वजह से कई पत्रकारों को चोट भी पहुंची लेकिन फिर भी मीडिया अपना काम करता रहा. हर संभव इस खबर को लोगों तक पहुंचाया. पंचकूला में यह भी देखा गया कि जब मीडिया के ऊपर हमला हो रहा था तब पुलिस चुपचाप खड़ी थी. यह भी देखा गया कि राम रहीम के समर्थकों के डर से पुलिस भी भागते हुए नज़र आई. अगर पुलिस ही डर जाएगी तो आम लोगों का क्या होगा?



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