काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए जानवरों की मौत के बावजूद भी सालाना बाढ़ क्यों है जरूरी?

पिछले दस वर्षों में, 2018 को छोड़कर, काजीरंगा में लगभग हर मौसम में शक्तिशाली बाढ़ देखी गई है. संरक्षणवादियों का मानना है कि यह नया चलन है जो काफी चिंताजनक है.

काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए जानवरों की मौत के बावजूद भी सालाना बाढ़ क्यों है जरूरी?

पिछले 10 वर्षों में, काजीरंगा में लगभग हर साल विनाशकारी बाढ़ देखी गई है.

गुवाहाटी:

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य के अंदर, 1,055 वर्ग किलोमीटर में फैला एक विशाल क्षेत्र जिसमें नावों में सवार फॉरेस्ट गार्ड खतरनाक बाढ़ के पानी में बहादुरी से डटे हुए हैं, यहां रहने वाले जंगली जानवरों नजर रखने के लिए और उन्हें शिकारियों से बचाने के लिए. ब्रह्मपुत्र की बाढ़ के मैदानों में फैला काजीरंगा अभयारण्य बाघों, हाथियों और एक सींग वाले भारतीय गेंडों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर है. पिछले 27 सालों से 51 साल के बिपिन बरुआ इस राष्ट्रीय अभयारण्य में गार्ड के तौर पर जानवरों की रक्षा कर रहे हैं. बरुआ ने कई विनाशकारी बाढ़ों में जानवरों की बचाया है उन्होंने एनडीटीवी से बात करते हुए एक दिलचस्प किस्सा साझा किया. बिपिन बरुआ ने बाढ़ के पानी में डूबे जानवरों की तलाश करते हुए कहा,  "जब काजीरंगा में अच्छी तरह से बाढ़ नहीं आती है, तो हमने जंगली जानवरों के बीच बीमारियों के मामलों में वृद्धि देखी है," 

पिछले कुछ दिनों से बाढ़ का पानी फिर से घटने लगा, लेकिन बारिश के एक नए दौर ने पार्क के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को फिर से जलमग्न कर दिया. अभयारण्य पहले ही कई बाढ़ों में 116 जानवरों को खो चुका है. फिर भी, काजीरंगा के जानवरों के लिए बाढ़ आवश्यक है. काजीरंगा नेशनल पार्क के निदेशक पी शिवकुमार ने एनडीटीवी को बताया, "काज़ीरंगा एक नदी का इकोसिस्टम है और नदी घास के मैदान को साफ करने में मदद करती है और अधिक बाढ़ के साथ घास के मैदान में अधिक पोषण जुड़ जाता है. यही कारण है कि काजीरंगा सबसे स्वस्थ घास के मैदानों में से एक है."

पिछले दस वर्षों में, 2018 को छोड़कर, काजीरंगा में लगभग हर मौसम में शक्तिशाली बाढ़ देखी गई है. संरक्षणवादियों का मानना है कि यह नया चलन है जो काफी चिंताजनक है. भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (डब्ल्यूटीआई) के संयुक्त निदेशक डॉ.रथिन बर्मन ने कहा, "हमें बाढ़ की आवश्यकता है. लेकिन अतीत में, ऐसी भारी बाढ़ हर दस साल में एक बार होती थी.

हालांकि, अब यह लगभग हर साल होती है शायद नदी के प्रवाह के कारण " इन घास के मैदानों और आर्द्रभूमि में रहने वाले जानवर अक्सर उच्च बाढ़ में डूब जाते हैं. अधिकांश जानवरों को ऊंचे मैदानों पर शरण लेने के लिए धकेला जाता है और अक्सर वे किनारे के गांवों में भटक जाते हैं, जिससे स्थानीय ग्रामीणों के साथ मुठभेड़ की संभावना बढ़ जाती है. एक राष्ट्रीय राजमार्ग अब पशु गलियारे से होकर गुजरता है जहां थोड़े ही समय में रिसोर्ट्स और रेस्त्रां बन गए हैं. ऐसे में इंसानों और पशुओं की बीच मुठभेड़ों की संभावना बढ़ रही है क्योंकि जानवर बाढ़ के पानी के प्रकोप से बचने की कोशिश करते हैं हुए यहां पहुंच जाते हैं.

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