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क्यों नहीं बिक रहा पारले-जी? जानिए 1 रुपये और 3 बिस्कुट की कहानी

हाल ही में आपने खबर देखी दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्कुट को बनाने वाली कंपनी पारले अपने 10 हज़ार कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है.

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क्यों नहीं बिक रहा पारले-जी? जानिए 1 रुपये और 3 बिस्कुट की कहानी

पारले जी बिस्किट की प्रतीकात्मक तस्वीर

खास बातें

  1. पारले जी की बिक्री में आई गिरावट
  2. आखिर क्या हो सकती है वजह?
  3. जानिए 1 रुपये और 3 बिस्कुट की कहानी
नई दिल्ली:

हाल ही में आपने खबर देखी दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्कुट को बनाने वाली कंपनी पारले अपने 10 हज़ार कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है. कंपनी की दलील है कि मार्केट में डिमांड कम होने के चलते उसका माल कम बिक रहा है. हमने जानने की कोशिश की कि आखिर पारले जी जैसा बिस्कुट क्यों नहीं बिक रहा है? हम पहुंचे साहिबाबाद इंडस्ट्रियल एरिया. साहिबाबाद इंडस्ट्रियल एरिया दिल्ली की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश का एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है. यहां करीब 10,000 कारखाने हैं जिनमें करीब ढाई लाख मजदूर काम करते हैं. मजदूर वर्ग में पारले-जी खासा लोकप्रिय माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस बिस्किट में ग्लूकोज की मात्रा ज्यादा होती है जिससे मजदूर कम पैसा खर्च करके ज्यादा ऊर्जा पा लेता है और कुछ समय के लिए उसका पेट भर जाता है भूख शांत हो जाती है.

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रामनिवास यहां पर बीते 28 साल से चाय की दुकान चलाते हैं ज़्यादातर मज़दूर ही इनके ग्राहक हैं. बताते हैं कि पहले रोजाना 24 पारले जी बिस्कुट के पैकेट बिक जाया करते थे, जबकि अब मुश्किल से 2-3 बिकते हैं. बता रहे हैं कि जबसे पारले जी ने 4 रुपये के बिस्कुट के पैकेट के दाम 5 रुपए किये और बिस्कुट के पैकेट में 16 की जगह 13 बिस्कुट कर दिए तबसे मज़दूर को पारले जी महंगा लगने लगा है और वो दूसरे सस्ते विकल्प की तरफ़ जा रहा है.

रामनिवास ने बताया, पारले जी की बिक्री अब बहुत घट गई है. पहले रोजाना 24 पीस बेच दिया करते थे, लेकिन अब मुश्किल से दो तीन पीस ही बिक पा रहे हैं. बीते छह-सात महीने में ज्यादा अंतर पड़ा है. लोग अब चाय के साथ पारले जी बिस्कुट लेने की बजाए पापे, मट्ठी, रस्क ले रहे है. बिस्कुट का पैकेट छोटा है, 5 रुपये का जबकि दूसरे विकल्प 1 रुपये का एक है जिससे पेट भर जाता है.

चाय की दुकान पर हमें बहुत से मजदूर मिले. एक फैक्ट्री में काम करने वाले किशोर कुमार शर्मा ने बताया कि पहले के मुकाबले पारले जी बिस्कुट 1 रुपए महंगा हो गया है और तीन बिस्किट भी उसमें कम हो गए हैं जिसकी वजह से हम लोग पारले जी बिस्कुट अब नहीं खा रहे हैं. साथ ही यहां पर कंपनियों की हालत बहुत खराब है जिसके चलते हमको वेतन मिलने में भी दिक्कत आ रही है.

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एक निजी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले ओमपाल मिले. 8 हज़ार रुपये महीना कमाते हैं. बताते हैं जबसे पारले जी ने बिस्कुट के पैकेट का वजन घटाया, तबसे चाय के साथ पापे खाकर काम चला रहे हैं और हर बार 2 रुपये बचा रहे हैं.

मजदूर यूनियन के मुताबिक पहले पारले जी मजदूर वर्ग का सबसे सस्ता और फेवरेट था, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद मजदूर का वेतन तो बढ़ नहीं रहा बल्कि नौकरी जाने का डर ज़्यादा है, ऊपर से पारले जी का वज़न और घट गया. इसलिए मजदूरों एक एक रुपये बचाने में लगे हैं जिससे उसे 5 रुपए का बिस्कुट भी महंगा लगने लगा है. 

सेंटर फॉर इंडस्ट्रियल ट्रेड यूनियन के साहिबाबाद प्रमुख ईश्वर सिंह त्यागी ने कहा, मजदूर सोच रहा है कि किसी तरकीब से अपना एक एक रुपया बचाए. चाय पानी में एक दो रुपये बचाए 5-10 रुपये बचाए. उधर बिस्कुट में बचाए. अब देखो पारले जी का बिस्कुट पहले लोग खा लिया करते थे. मजदूर बहुत खुश होकर पारले जी का बिस्कुट खाया करता था, लेकिन अभी क्या हो गया है पारले जी का बिस्कुट 5 रुपए का आ रहा है उसी में मजदूर 2 रुपए की मट्ठी खा ले रहा हैं. बिस्कुट की क्षमता घटा दी गई है. पहले एक पैकेट में 16 बिस्कुट आया करते थे अब 13 आ रहे हैं.

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कुल मिलाकर कहानी यह है कि पहले पारले जी 4 रुपए का बिस्कुट का पैकेट आया करता था, जिसमें 16 बिस्कुट मिला करते थे. लेकिन जीएसटी आने के बाद बिस्कुट पर टैक्स 12 फ़ीसदी से बढ़कर 18 फ़ीसदी हो गया. जिसके चलते कंपनी ने बिस्किट के पैकेट पर 1 रुपए बढ़ाया और तीन बिस्कुट कम कर दिए. देश में आर्थिक हालात भी खराब चल रहे हैं, ऐसे में मजदूर वर्ग को ये फैसला रास नहीं आया जिसके चलते डिमांड कम हो गई और नतीजा ये कि कंपनी कर्मचारियों की छंटनी की बात कर रही है.

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