कोई साथ दे या न दे, आज मेरी पहचान यही है - "मैं महिला क़ाज़ी जहांआरा हूं..."

कोई साथ दे या न दे, आज मेरी पहचान यही है -

नई दिल्ली:

"ईश्वर सिर्फ एक है और मोहम्मद उनके पैगम्बर हैं... अल्लाह सभी को एक जैसा मानता है, लेकिन हमारा समाज उन्हें बांट देता है... कहते हैं, यह काम तू इसलिए नहीं कर सकती, क्योंकि तू औरत है, और मैं यह काम इसीलिए कर सकता हूं, क्योंकि मैं मर्द हूं..." यह बात NDTV के सौरभ शुक्ला से बातचीत में कही राजस्थान की पहली महिला क़ाज़ी जहांआरा ने...

पिछले कुछ दिनों के दौरान आपने भी टीवी या अख़बारों में देखा-पढ़ा होगा कि राजस्थान में पहली बार एक महिला क़ाज़ी बन गई है, और जब इस पुरुष-प्रधान समाज में कोई महिला क़ाज़ी बनेगी, तो विवाद तो होना ही था... सो, सभी विवादों के बीच जहांआरा से फोन पर बात की गई, ताकि उनके व्यक्तिगत जीवन में झांका जा सके, जाना जा सके कि वह कैसे यहां तक पहुंच पाईं...

जहांआरा का जन्म गुलाबी शहर कहे जानने वाले जयपुर के रामगंज बाज़ार में अकबर अली और शौकत आरा के घर सन् 1971 में हुआ। जहांआरा का परिवार साधारण-सा था, और उनके वालिद PWD में कॉन्ट्रैक्टर थे और मां बेगम शौकत आरा गृहिणी थीं। क़ाज़ी साहिबा बताती हैं कि कॉन्ट्रैक्टर साहब का रामगंज बाज़ार में रुतबा था, आखिर PWD में कॉन्ट्रैक्टर थे... दो बेटियों में जहांआरा बड़ी थीं, सो अपने पिता को बहुत प्यारी थीं। अपने पिता के बारे में बात कर जहांआरा काफी खुश भी लग रहीं थी, और उनकी आवाज़ में खनक आ गयी थी।

वह बता रही थीं कि किस तरह उनके वालिद उन्हें पढ़ाना चाहते थे, लेकिन खुदा को कुछ और ही मंज़ूर था, क्योंकि जब जहांआरा 12वीं में पढ़ती थीं, वह चल बसे। यह बताते-बताते जहांआरा की आवाज़ की खनक कहीं खो गई... मुझे लगा, फोन कट गया, सो मैंने दो बार 'हल्लो हल्लो' कहा... उधर से आवाज़ आई, "जी ज़रा..." मैं समझ गया, वह गला भर आने की वजह से खामोश हो गई हैं...

मैंने बात बदलने के लिए सवाल बदल दिया, पूछा, "आपके कितने बच्चे हैं..." वह तपाक से बोलीं, "चार... दो बेटे हैं और 2 बेटियां... मेरी बड़ी बेटी 16 साल की है, और सबसे छोटा बेटा है, जो आठ साल का है..." जहांआरा की आवाज़ की खनक लौट आई थी...

फिर मैंने पूछा, "वालिद साहब के गुज़रने के बाद आपने पढ़ाई नहीं की...?" जहांआरा का जवाब आया, "नहीं, पढ़ना मुश्किल था, क्योंकि घर में कमाने वाले सिर्फ अब्बू थे और उनके बाद पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे..." लेकिन तभी उनकी आवाज़ बेहद मजबूत हो गई, जिसमें उन्होंने बताया, "सर, हमने बहुत संघर्ष किया है..."

घर चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाती रहीं जहांआरा से हमने पूछा, "आज आप राजस्थान की पहली महिला क़ाज़ी बन गई हैं... यहां तक पहुंचने में आपका साथ किसने दिया...?" उन्होंने जवाब दिया, "मेरी मां ने..." फिर मैंने पूछा, "क्या आपके पति सहयोग करते थे...?" अब जहांआरा कुछ पल के लिए खामोश हो गईं, फिर बोलीं, "सर, आप कुछ और पूछिए..."

समझ में आ गया कि हमारे समाज में जब भी कोई महिला अपना धार्मिक अधिकार मांगती है, पुरुषों से अक्सर चुप्पी ही मिलती है...

खैर, फिर मैंने पूछा, "आपकी शादी कब हुई थी...?" तो जहांआरा ने कहा, "शादी जल्दी ही हो गई थी... लेकिन सर, आप प्लीज़ कुछ और पूछिए... यह थोड़ा पर्सनल है... बस, मैं इतना बता सकती हूं कि अब हम साथ नहीं रहते..."

मुझे सारे जवाब मिल गए थे...

फिर भी मैंने कहा, "इस सबके बाद यहां तक पहुंचना तो मुश्किल रहा होगा...?" जवाब मिला, "हां, लेकिन मुझे शुरू से ही समाजसेवा का शौक था, और मेरी मां हमेशा मेरा साथ देती रहीं..."

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जहांआरा के मुताबिक, वह सबसे पहले राष्ट्रीय मुस्लिम महिला वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़ीं, फिर वर्ष 2010 में वह भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ गईं, जहां मुस्लिम महिलाओं के 'कुरानी अधिकारों' के लिए उनकी लड़ाई शुरू हो गई... जहांआरा बताती है कि उसके बाद उन्होंने मुंबई के 'दारुल उलूम ए निशवा' से दो साल की क़ाज़ियत की ट्रेनिंग ली और समझा कि किस तरह पिछले 1500 सालों में मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों से दूर रखा गया है...

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पति से अलग रहकर अपने चार बच्चों को पढ़ा रहीं जहांआरा कहती हैं, उन्होंने क़ाज़ियत की ट्रेनिंग 69 फीसदी अंकों से पास की... लेकिन उनकी जिस बात ने दिल को सबसे ज़्यादा छुआ, वह तब सुनने को मिली, जब मैंने सवाल किया, "आज आपकी पहचान क्या है...", तो जहांआरा ने बेहद भरोसे के साथ तपाक से जवाब दिया, "मैं महिला क़ाज़ी जहांआरा हूं..."