जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी कार्रवाई को 'ब्लैक डे' के तौर पर मनाएगी केंद्र सरकार

जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधि एक बार फिर से सक्रिय हो गई है क्योंकि पिछले कुछ दिनो  में घाटी के कई बड़े नेताओं की रिहाई हुई है.

जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी कार्रवाई को 'ब्लैक डे' के तौर पर मनाएगी केंद्र सरकार

प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली:

जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधि एक बार फिर से सक्रिय हो गई है क्योंकि पिछले कुछ दिनो  में घाटी के कई बड़े नेताओं की रिहाई हुई है. इस बीच गुरुवार को केंद्र सरकार यह दिखाने के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है जिसका फ़ोकस है कि कैसे पाकिस्तानी कार्रवाई ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दिया और पड़ोसी देश किस तरह से राज्य में लोगों की पीड़ा के लिए जिम्मेदार है.

22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर पाकिस्तान की कार्रवाई के दिन को "ब्लैक डे" के रूप में मनाया जाएगा. बता दें कि  इस दिन पाकिस्तान समर्थित कबीलियाइयों ने जम्मू और कश्मीर पर आक्रमण किया था. इसके बाद कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में आ गया था जिसे पीओके के नाम से जाना जाता है.

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केंद्रीय संस्कृति सचिव राघवेंद्र सिंह ने NDTV को बताया,“हम एक प्रदर्शनी का आयोजन कर रहे हैं जिसमें पुराने वीडियो, कोलाज, तस्वीरें और दस्तावेज हैं जो स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं कि कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जाने के लिए तैयार नहीं थे. यहां तक ​​कि नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन नेता शेख अब्दुल्ला भी अनिच्छुक थे .” 

उनके अनुसार, दस्तावेजों ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि शेख अब्दुल्ला ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को नकार दिया जिसने पाकिस्तान को और आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा, "पाकिस्तान के पास कश्मीर पर आक्रमण करने की योजना थी जैसे उन्होंने बलूचिस्तान पर हमला किया था, लेकिन भारत कश्मीर के बचाव में आया."

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, "कुल्हाड़ियों, तलवारों और बंदूकों और हथियारों से लैस कबीलियाइयों के 'लश्कर'  ने कश्मीर पर हमला किया." 

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन के सहयोग से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय एक प्रदर्शनी का आयोजन कर रहा है. प्रदर्शनी और संग्रहालय के अलावा, केंद्र सरकार 20 प्रतिष्ठित इतिहासकारों, पूर्व सेना कमांडरों, प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं, लेखकों और पत्रकारों के साथ पैनल चर्चा भी आयोजित कर रही है.

संस्कृति सचिव ने कहा, ''इनमें लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (retd), कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति, जेएनयू के प्रोफेसर अमिताभ मट्टू, हरियाणा एकेडमी ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर के प्रो रघुवेंद्र तंवर, मेजर जनरल थपलियाल (retd) आदि शामिल हैं. "लोगों के बीच एक संवाद बनाने के लिए इस तरह के ऐतिहासिक आख्यान को चित्रित करना आवश्यक है. इस तरह की पहल का उद्देश्य हमारे इतिहास के इस चरण के बारे में लोगों में जागरूकता लाना होगा. यह याद रखने में मदद करेगा कि देश पहले कैसे लड़ा. संघर्ष का सामना भारत ने किया.''

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गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने कहा,"आक्रमणकारियों की हिंसा और अत्याचार को याद करना और इस चुनौती पर काबू पाने में प्रदर्शित वीरता उन लोगों के लिए एक श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की पहली लड़ाई में अपना जीवन लगा दिया. उक्त प्रदर्शनी या स्मारक अपनी तरह का पहला कार्यक्रम होगा. " हालांकि, नई दिल्ली में भी हर कोई इस विचार के साथ नहीं है.

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कश्मीर में मुद्दों को संभालने वाले एक पूर्व नौकरशाह ने कहा, "सरकार सिर्फ जम्मू और कश्मीर में पैदा हुई गंदगी से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि धारा 370 को रद्द कर दिया गया है. घाटी के युवा अभी भी देश के बाकी हिस्सों से अलग महसूस करते हैं."  उनके अनुसार, अब जबकि राजनीतिक गतिविधि फिर से शुरू हो गई है, ज्यादातर नेता अनुच्छेद 370 के राज्यवाद और प्रावधानों को बहाल करना चाहते हैं.

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