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Exclusive: हुगली नदी के नीचे से गुज़रेगी मेट्रो ट्रेन, देखें - कैसे बनाई जा रही है सुरंग

हावड़ा छोर पर सुरंगों को खोदने का काम अप्रैल माह के अंत में शुरू हुआ था. ये सुरंगें 520 मीटर लम्बी और लगभग 30 मीटर गहरी हैं, और नदी के नीचे से होकर जाने वाली मेट्रो को यह सुरंग पार करने में कुल 60 सेकंड का वक्त लगेगा.

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Exclusive: हुगली नदी के नीचे से गुज़रेगी मेट्रो ट्रेन, देखें - कैसे बनाई जा रही है सुरंग
कोलकाता: सुरंगें खोदने वाली दो उत्कृष्ट मशीनें, जिन्हें 'रचना' और 'प्रेरणा' नाम दिए गए हैं, पूरी तेज़ी से कोलकाता में हुगली नदी के नीचे खुदाई के काम में जुटी हुई हैं, और यदि सब कुछ ठीक रहा, तो दिसंबर, 2019 में देश में पहली बार किसी नदी के नीचे से मेट्रो ट्रेन गुज़रेगी.

हावड़ा छोर पर सुरंगों को खोदने का काम अप्रैल माह के अंत में शुरू हुआ था. ये सुरंगें 520 मीटर लम्बी और लगभग 30 मीटर गहरी हैं, और नदी के नीचे से होकर जाने वाली मेट्रो को यह सुरंग पार करने में कुल 60 सेकंड का वक्त लगेगा.

kolkata metro tunnel

सुरंगें खोदने वाली 90-मीटर लम्बी मशीनों 'रचना' व 'प्रेरणा' के नाम सड़क हादसे में मारे गए एक प्रोजेक्ट अधिकारी की बेटियों के नाम पर रखे गए हैं. इन मशीनों को हिस्सों के रूप में जर्मनी से लाया गया था, और यहां लाकर उन्हें ज़मीन के नीचे ही जोड़ा गया (असेम्बल किया गया). 'रचना' को तो हुगली नदी के पार पहुंचाने में एक महीने से भी ज़्यादा वक्त लगा था.

फिलहाल कामगारों, तथा जब मेट्रो तैयार हो जाएगी, उस समय यात्रियों की सुरक्षा के लिए बेहतरीन प्रबंध किए जा रहे हैं. इस समय सुरंग को तैयार करने के दौरान कॉन्क्रीट के खास सेक्शनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें विशेष गास्केट लगे हैं, जो पानी से संपर्क में आते ही फैल जाते हैं, ताकि किसी भी संभावित लीकेज का खतरा दूर हो सके.

कोलकाता मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (केएमआरसीएल) के प्रबंध निदेशक सतीश कुमार ने कहा, "यह बहुत बड़ी चुनौती है..." उन्होंने बताया, "नर्म ज़मीन का भी मसला था... चट्टानों को काट डालना कम मुश्किल होता है... विदेशों में इस तरह के प्रोजेक्टों में पानाी के रिसाव की घटनाएं होती रही हैं, जो काम की गति को धीमा कर देती हैं... हम किसी तरह का कोई रिसाव नहीं चाहते..."

----- ----- वीडियो रिपोर्ट ----- -----
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इन सुरंगों का एक अहम पहलू यह भी है कि ये सुरंगें ऐसी तीन-तीन इमारतों से 100 मीटर से भी कम दूरी से गुज़रेंगी, जिन्हें धरोहर का दर्जा प्राप्त है, और इस वजह से इन सुरंगों के लिए भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई या Archeological Survey of India) से अनुमति ज़रूरी है.

केएमआरसीएल के अध्यक्ष विश्वेश चौबे ने कहा, "काम धीमा हो गया, क्योंकि हम भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंज़ूरी के बिना धरोहर कही जाने वाली इमारतों के नीचे काम नहीं कर सकते..." उन्होंने कहा कि इसके जल्दी ही मिल जाने की उम्मीद है. एमडी सतीश कुमार ने भी मिलती-जुलती बात की, और कहा कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंज़ूरी मिल जाना महज़ वक्त की बात है.

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सतीश कुमार ने कहा, " आईआईटी - खड़गपुर ने स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया और प्रमाणित किया कि हम जिन तरीकों से काम कर रहे हैं, उनसे धरोहर कही जाने वाली इमारतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना सुनिश्चित हो सकेगा..."

इस परियोजना को लेकर कामगार और अधिकारी भी काफी उत्साहित और आशावान हैं. चीफ इंजीनियर परशुराम सिंह का कहना था, "कोलकाता को ही देश की सबसे पहली मेट्रो चलाने का गौरव हासिल हुआ था... और अब, इस बात का गौरव भी कोलकाता को ही मिलेगा कि नदी के नीचे से गुज़रने वाली देश की पहली मेट्रो भी यहीं चलेगी..."


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