प्रदूषण और कम उम्र में तनाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए है बेहद खतरनाक

“दिमाग पर असर डालने वाले वायु प्रदूषण के सबसे आम विषैले पदार्थ पोलिसाइकलिक अरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स (पीएएच) से जन्म से पूर्व संपर्क, कम उम्र के सामाजिक एवं आर्थिक दवाब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को बढ़ा सकते हैं या बरकरार रख सकते हैं.

प्रदूषण और कम उम्र में तनाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए है बेहद खतरनाक

प्रदूषण, कम उम्र में तनाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए दोहरी मार : अध्ययन

न्यूयॉर्क:

जन्म से पूर्व वायु प्रदूषण से बहुत ज्यादा संपर्क और घर पर कम उम्र में अत्यधिक तनाव झेलना, बच्चों में ध्यान देने और विचार संबंधी समस्या होने के जोखिम को बढ़ा देता है. एक अध्ययन में यह सामने आया है.

अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के अलावा अन्य संस्थाओं के शोधकर्ताओं ने कहा कि सुविधाहीन पृष्ठभूमि वाले बच्चों में कम उम्र में तनाव बहुत आम है जो अक्सर वायु प्रदूषण से अत्यधिक संपर्क वाले इलाकों में रहते हैं.

इस अध्ययन में स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चों पर वायु प्रदूषण और कम उम्र के तनाव के संयुक्त प्रभावों का आकलन किया गया है.

अध्ययन के पहले लेखक कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड पगलियासियो ने कहा, “दिमाग पर असर डालने वाले वायु प्रदूषण के सबसे आम विषैले पदार्थ पोलिसाइकलिक अरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स (पीएएच) से जन्म से पूर्व संपर्क, कम उम्र के सामाजिक एवं आर्थिक दवाब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को बढ़ा सकते हैं या बरकरार रख सकते हैं.

इस नये शोध में अमेरिका में मांओं एवं बच्चों पर सीसीसीईएच की ओर से किए गए अध्ययन के डेटा का विश्लेषण किया गया.
इसमें गर्भवती महिलाओं की पीठ पर गर्भावस्था की तीसरी तिमाही के दौरान वायु निगरानी करने वाला एक थैला लटकाया गया जो वायु प्रदूषकों से उनके संपर्क को मापता था.

बाद में इन मांओं ने अपने बच्चों के पांच, सात, नौ और 11 साल के होने पर उनके जीवन में आए तनाव के साथ ही उनके आस-पड़ोस का वातावरण, वस्तुओं के अभाव, साथी की हिंसा, ज्ञात तनाव, सामाजिक सहायता का अभाव और सामान्य परेशानियों के स्तर संबंधी सूचना मुहैया कराई.

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शोधकर्ताओं ने पाया कि 11 साल की उम्र में बच्चों में वायु प्रदूषण और कम उम्र के तनाव का संयुक्त असर देखा गया जिसमें विचार एवं ध्यान देने की समस्या देखी गई.

यह अध्ययन ‘चाइल्ड साइकोलॉजी एंड साइकाइट्री' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.