कैंसर का दर्द या दवाइयों का अभाव नहीं, ये एक चीज़ वक्त से पहले ले रही है मरीज़ों की जान

दो सालों तक मरीजों के चिकित्सीय आंकड़ों के आकलन से पता चला कि अधिक डिप्रेशन पीड़ित रोगियों की जीवन जीने की संभावना भी बहुत कम होती है और उनके कीमोरेडिएशन और बाकी इलाज में भी बाधाएं उत्पन्न होती हैं. 

कैंसर का दर्द या दवाइयों का अभाव नहीं, ये एक चीज़ वक्त से पहले ले रही है मरीज़ों की जान

अवसाद के कारण घट रही कैंसर रोगियों की जीवन दर

खास बातें

  • सिर व गर्दन के कैंसर पीड़ितों में पाए गए ज़्यादा लक्षण
  • 134 मरीजों पर हई रिसर्च
  • चार साल तक जीने वाले मरीज दो साल में ही मर रहे हैं
नई दिल्ली:

कहते हैं खुश रहने से बीमारियां दूर भाग जाती हैं. इसी वजह से आपने लोगों को सुबह पार्क में लाफिंग एक्सरसाइज़ करते हुए देखा होगा. वहीं, इससे उलट उदास रहने से शरीर को रोग जल्दी घेर लेता है. बीमारी कोई भी हो उदास मन उसे और खतरनाक बना देता है. 

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डिप्रेशन सामान्य स्वस्थ्य शरीर को रोगी बना सकता है. वहीं, अगर कोई सिर व गर्दन के कैंसर जैसे खतरनाक रोग से पीड़ित हो तो इससे उस रोगी के अधिक समय तक जीने की संभावनाएं कम हो जाती हैं. अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि निदान के समय रोगियों में डिप्रेशन की जांच और उससे संबंधित लक्षणों का इलाज किया जाना चाहिए. 

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यूनिवर्सिटी ऑफ लुइसविले स्कूल ऑफ मेडिसिन से इस अध्ययन की सह-लेखक एलिजाबेथ कैश ने कहा, "शोध के दौरान हमने पाया है कि अगर कोई कैंसर रोगी चार साल तक जीवन जीने वाला है तो डिप्रेशन के कारण वह केवल दो साल ही जाता है और यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए कढ़वी सच्चाई है जो उपचार के दौरान अच्छी प्रतिक्रिया नहीं देते हैं." 

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शोधार्थियों के अनुसार, "सिर व गर्दन के कैंसर पीड़ितों में अवसाद के लक्षण भी मिलते हैं, जिससे उनके सामने चिकित्सीय दुष्प्रभाव का सामना करने, धूम्रपान छोड़ने, पर्याप्त पोषण या नींद की आदतों को सही रखने की चुनौती खड़ी हो जाती है." 

क्या डिप्रेशन के लक्षण रोगियों के स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं? यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने सिर और गर्दन के कैंसर से पीड़ित 134 मरीजों का आकलन किया, जिन्होंने अपने इलाज के दौरान डिप्रेशन के लक्षणों की जानकारी दी थी. 

शोधार्थियों द्वारा दो सालों तक मरीजों के चिकित्सीय आंकड़ों के आकलन से पता चला कि अधिक डिप्रेशन पीड़ित रोगियों की जीवन जीने की संभावना भी बहुत कम होती है और उनके कीमोरेडिएशन और बाकी इलाज में भी बाधाएं उत्पन्न होती हैं. 

यह शोध 'कैंसर' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. 

INPUT - IANS

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