सिर्फ फल खाता है ये शख्‍स, 90 किलो से हुआ 63 किलो, अब किया ऐसा काम

एलधो ने यह भी बताया कि जब से उन्‍होंने फल खाना शुरू किया तब से उन्‍हें अपने शरीर और स्‍वास्‍थ्‍य में सकारात्‍मक बदलाव दिखाई दिए.

सिर्फ फल खाता है ये शख्‍स, 90 किलो से हुआ 63 किलो, अब किया ऐसा काम

एलधो और उनका पूरा परिवार भोजन के रूप में फल ही खाता है

नई दिल्ली:

तिरुवनंतपुरम के रहने वाले पूर्व आर्किटेक्‍ट एलधो पचीलक्‍कदन लगभग एक दशक से सिर्फ फलों पर जिंदा है. यही नहीं उनकी पत्‍नी और बेटा-बेटी भी उन्‍हीं के नक्‍शे-कदम पर चल रहे हैं. दरअसल, एलधो का मानना है कि पका हुआ भोजन असली खाना नहीं है. बहरहाल, फलों के प्रति अपने इस अगाध प्रेम की बदौलत उन्‍होंने 10 एकड़ बंजर जमीन को फलों के फार्म में बदल दिया है.

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इंडियन एक्‍सप्रेस की खबर के मुताबिक, एलधो ने साल 2009 में केरल के मुन्‍नार के पास इदुक्‍की की पहाड़‍ियों पर स्‍वर्गम मेदू में अपने एक दोस्‍त के साथ 10 एकड़ जमीन खरीदी थी. अब यह जमीन फलों का जंगल बन चुकी है, जिसमें ढेर सारे फूल, घास और पेड़ों के फल हैं. यहां पेड़ों पर आपको ब्‍लैकबेरीज़, आम और सेब लदे दिख जाएंगे. 

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एलधो के मुताबिक, "जब आप प्रकृति को गौर से देखते हैं तो आपको पैटर्न समझ में आने लगता है. मैंने यह नोटिस करना शुरू किया कि भोजन कितना जरूरी है, दूसरे प्राणि क्‍या खाते हैं और यह किस तरह से खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करते हैं और बदले में इससे आसपास की दूसरी चीजें कैसे प्रभावित होती हैं." 

उन्‍होंने कहा, "प्रकृति को इसी तरह बनाया गया है ताकि वो हम सभी को स्‍वस्‍थ रख सके. उसके पास भोजन है, जहर है, बीमार‍ियां हैं, लेकिन उसके पास दवाइयां भी हैं. अगर यह प्रवाह टूट जाए तो हम सब बीमार हो जाते हैं." 

एलधो ने यह भी बताया कि जब से उन्‍होंने फल खाना शुरू किया तब से उन्‍हें अपने शरीर और स्‍वास्‍थ्‍य में सकारात्‍मक बदलाव दिखाई दिए. पहले वह 90 किलो के हुआ करते थे और उन्‍हें डायबिटीज भी थी, लेकिन अब उनका वजन 63 किलो है और वह पूरी तरह से फिट और तंदरुस्‍त हैं. 

एलधो और उनकी टीम ने एरनाकुलम और कोट्टयम में घरों के पास इसी तरह के फार्म बनाए हैं. 

वह कहते हैं, "दरअसल, इसके पीछे मकसद यह है कि एक ऐसा ईकोसिस्‍टम बनाया जाए जिसमें रोजाना खेत पर बिताए बिना सब्‍जियों और फलों के रूप में इतना भोजन उगाया जा सके कि एक साल आराम से निकल जाए."

बहरहाल, हम तो यही कहेंगे कि एलधो ने जिस तरह एक बंजर जमीन पर पेड़ लगाए वह प्रेरणादायी तो है ही साथ ही पर्यावरण के लिए भी काफी फायदेमंद है.

 
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