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नॉर्मल डिलीवरी Vs सिजेरियन: क्‍या एक होनी चाहिए फीस?

करीब एक दशक में सिजेरियन डिलीवरी में हुई दोगुना वृद्धि चौंका देने वाली है. इसके पीछे का कारण सिजेरियन में आने वाला मोटा खर्च है, जिसे बताकर निजी अस्पताल मरीजों से लंबी चौड़ी रकम वसूलते हैं.

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नॉर्मल डिलीवरी Vs सिजेरियन: क्‍या एक होनी चाहिए फीस?

सिजेरियन में मोटा खर्च आता है, जिसे बताकर निजी अस्पताल मरीजों से लंबी चौड़ी रकम वसूलते हैं

खास बातें

  1. स‍िजेर‍ियन ड‍िलीवरी के बहाने मोटी फीस वसूलते हैं डॉक्‍टर
  2. नॉर्मल और स‍िजेर‍ियन ड‍िलीवरी की फीस एक होनी चाह‍िए
  3. हालांक‍ि डॉक्‍टर्स का कहना है क‍ि फीस तय करना डॉक्‍टर का अध‍िकार है
नई द‍िल्‍ली : पिछले कुछ सालों में सिजेर‍ियन डिलीवरी के मामलों में खासी बढ़ोतरी हुई है. न सिर्फ विदेशों में बल्‍कि अब भारत में भी नॉर्मल यानी कि नैचुरल तरीके से बच्‍चे पैदा करने के बजाए ऑपरेशन को तरजीह दी जाने लगी. यही नहीं अब तो कई बार डॉक्‍टर पहले से ही नॉर्मल डिलीवरी में दिक्‍कत की बात कहकर सीजेरियन डिलीवरी करवाने के लिए कह देते हैं. और तो और नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी में खर्च भी अलग-अलग आता है. जहां नॉर्मल डिलीवरी कम पैसों में होती है वहीं सिजेरियन के लिए ज्‍यादा पैसे वसूले जाते हैं. यही वजह है कि डॉक्‍टर नॉमल के बजाए बार-बार सिजेरियन डिलीवरी के लिए जोर डालते हैं. 

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नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएचएफएस) की हाल में जारी चौथी रिपोर्ट (2015-16) में सिजेरियन (ऑपरेशन) के जरिए होने वालों बच्चों का फीसदी 17.2 दर्शाया गया, जबकि तीसरी रिपोर्ट (2005-06) में यह आंकड़ा 8.5 फीसदी था. करीब एक दशक में सिजेरियन डिलीवरी में हुई दोगुना वृद्धि चौंका देने वाली है. इसके पीछे का कारण सिजेरियन में आने वाला मोटा खर्च है, जिसे बताकर निजी अस्पताल मरीजों से लंबी चौड़ी रकम वसूलते हैं. 

बेंगलुरू में निजी अस्पतालों द्वारा नॉर्मल डिलीवरी के लिए 8,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक लिए जाते हैं, वहीं सिजेरियन के लिए यह राशि 45,000 से लेकर 1.56 लाख रुपये तक मरीजों से वसूली जाती है.

दिल्ली में नॉर्मल डिलीवरी के लिए जहां 15,000 रुपये से लेकर 48,000 तक लिए जाते हैं, वहीं सिजेरियन डिलीवरी के लिए 50,000 रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक लिए जाते हैं. इसके अलावा मुंबई में नार्मल डिलीवरी के लिए 8,000 से लेकर 45,000 रुपये तक मरीज अदा करते हैं, जबकि सिजेरियन डिलीवरी के लिए 1.60 लाख रुपये तक वसूले जाते हैं. 

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नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी के बिलों में भारी अंतर के कारण पिछले एक दशक में सिजेरियन में दोगुनी वृद्धि दर्शाती है कि प्रत्येक राज्य में अब पहले की तुलना में सिजेरियन को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है.

एक साल पहले मुंबई में सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी पर एक शुल्क लगाने के लिए अभियान शुरू करने वाली सुवर्णा घोष ने अपने इस अभियान को देशभर में फैलाने का फैसला किया. सुवर्णा ने अभियान के तहत एक पीटीशन दायर की, जिसमें अस्पतालों से पूछा गया कि उनके यहां कितने सिजेरियन कराए गए. उनकी इस पीटीशन पर उन्हें अब तक 1.5 लाख लोगों का समर्थन मिल चुका है. 

सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी पर एक शुल्क लगाने के कदम को क्या अस्पताल स्वीकार करेंगे, इस सवाल पर सुवर्णा ने कहा, 'जी बिल्कुल, मुझे लगता है कि निजी अस्पताल इस कदम पर जरूर सहमत होंगे और वह स्वीकार भी कर रहे हैं, क्योंकि कुछ अस्पताल हैं जो अपने यहां सही तरीके से काम कर रहे हैं तो वह अपना काम आगे बढ़ाने के लिए अगर यह घोषित करते हैं, तो इसमें सबका फायदा है.'

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उन्होंने कहा, 'इससे उन्हें ही ज्यादा फायदा है, क्योंकि वह दिखा सकते हैं कि उनके यहां ट्रांसपेरेंसी है. मेरा मानना है कि वह जरूर मानेंगे, क्योंकि इसमें न मानने वाली कोई बात ही नहीं है और मुझे नहीं लगता है हर कोई आदमी मेडिकल पेशे में पैसों के लिए काम कर रहा है, कुछ लोग ऐसे भी है जो अच्छा काम करना चाहते हैं.'

निजी अस्पतालों में अनाप-शनाप बिल बनाने का मुद्दा उठाने वाले मोटिवेशनल स्पीकर और बिजनेस गुरु डॉ. विवेक बिंद्रा ने , 'भारत घनी आबादी वाला मूल्य संवेदनशील बाजार है, इसलिए सस्ती स्वास्थ्य सेवा हमारे देश में एकमात्र दीर्घकालिक समाधान है. स्वास्थ्य संस्थानों को अपनी नीति में बदलाव लाने की जरूरत है. उन्हें वैल्यू फॉर मनी मार्केट के तौर से उभरना होगा.'

उन्होंने कहा, 'इसलिए सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी पर एक ही शुल्क लेना एक क्रांतिकारी विचार है.'

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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात चिकित्सक केके अग्रवाल ने कहा, 'देश में सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी पर एक शुल्क लगाने का कदम सही नहीं है. हर डॉक्‍टर को अपने हिसाब से रेट रखने का अधिकार है. इसमें कोई दखलअंदाजी नहीं कर सकता. और जहां तक बात दोनों डिलीवरी के बिलों में अंतर की तो डॉक्‍टरों को बच्चों को भी बचाना होता है और देखना होता है कि सामान्य और सिजेरियन में कितनी जटिलताएं हैं.'

सुवर्णा के अभियान को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के समर्थन के सवाल पर अग्रवाल ने कहा कि संस्था ऐसे किसी भी अभियान को समर्थन नहीं देती और संस्था का सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी पर समान शुल्क लगाने के मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है. 

देशभर में बढ़ रहे सिजेरियन के मामलों से चिंतित होकर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने भी राज्यसभा में मामला उठाया था. इस बाबत स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों को दिशा-निर्देश भी जारी किया था.

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रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश में सिजेरियन के जरिए 40.1 फीसदी, लक्षद्वीप में 37.1, केरल 35.8, तमिलनाडु 34.1, पुदुच्चेरी 33.6, जम्मू-कश्मीर 33.1 और गोवा में 31.4 फीसदी बच्चे ऑपरेशन के जरिए पैदा हुए हैं. वहीं दिल्ली में सिजेरियन के जरिए पैदा होने वाले बच्चों का प्रतिशत 23.7 है.

Video: क्या डॉक्टर नॉर्मल डिलिवरी या ऑपरेशन को लेकर सही जानकारी देते हैं? Input: IANS


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