जेएनयू के छात्र आंदोलन के उमस भरे दिनों को बेबाक अंदाज में दर्शाती एक डायरी...

जेएनयू के छात्र आंदोलन के उमस भरे दिनों को बेबाक अंदाज में दर्शाती एक डायरी...

यह रचना पिछले साल के जेएनयू छात्र आंदोलन की तस्‍वीर को पेश करती है

पिछले साल फरवरी में देश की राजधानी दिल्‍ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के बाद जो विवाद शुरू हुआ, वह लंबे समय तक राष्‍ट्रीय सुर्खियों का सबब बना. तत्‍कालीन छात्र संघ अध्‍यक्ष समेत कई छात्रों की गिरफ्तारी हुई. उस घटना की पृष्‍ठभूमि में नए सिरे से 'राष्‍ट्र', 'राष्‍ट्रवाद', 'देशद्रोह' जैसे शब्‍दों की मीमांसा की गई. यूनिवर्सिटी के तनाव भरे उन्‍हीं दिनों को युवा कथाकार मिथिलेश प्रियदर्शी ने अपनी रचना ''जेएनयू वाली 'एंटीनेशनल' डायरी'' में अनौपचारिक शैली में पिरोने का प्रयास किया है.

व्‍हाट्सऐप्‍प, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल माध्‍यमों और साहित्‍य के मौजूदा परिदृश्‍य में डायरी शैली में लिखी गई यह रचना इस भूली-बिसरती विधा को फिर से जीवंत करने का एक प्रयास भी है. ये जेएनयू के उन गहमागहमी भरे दौर को शब्‍दों के माध्‍यम से उकेरने के साथ लेखक की बेबाक टिप्‍पणियों से युवा मन के रोमांच, क्षोभ और आक्रोश को दर्शाती है. रचनाकार के आक्रोश से सहमति या असह‍मति हो सकती है लेकिन इस डायरी की सार्थकता कम से कम इतनी तो है ही कि एक दस्‍तावेज के माध्‍यम से उस दौर के महीनों में यूनिवर्सिटी और छात्रों के भीतर उपजे उथल-पुथल को यह अभिव्‍यक्‍त करती है.

यद्यपि घटनाओं को सिलसिलेवार पेश करने के साथ-साथ जब लेखक के विचार घटनाक्रम पर हावी होने लगते हैं तो वो कई बार एकांगी हो जाते हैं और यह लेखक की 'भड़ास' के रूप में परिलक्षित होते हैं. लेकिन डायरी शैली की रचना होने के कारण संभवतया लेखक इतनी अनौपचारिकता का हक़दार है. संभवतया इसीलिए मिथिलेश प्रियदर्शी ने अपनी रचना का नाम भी जेएनयू वाली 'एंटीनेशनल' डायरी रखा है.

मिथिलेश ने अपनी डायरी में इस विश्‍वविद्यालय आंदोलन की परत दर परत को दर्ज करने के साथ ही सत्‍ता और मीडिया पर भी सवाल खड़े किए हैं. सत्‍ता की सांस्‍कृतिक, राजनीतिक एकाधिकार की प्रवृत्ति, सत्‍ताधारी दल से जुड़े छात्र संगठन की कारगुजारियों और मीडिया के एक धड़े से इसके गठजोड़ को बेबाकी और क्षोभ के साथ डायरी में दर्ज किया गया है. अपनी शैक्षणिक प्रतिष्‍ठा के साथ-साथ जेएनयू अलग-अलग कालखंडों में हुए छात्र संघ आंदोलनों और छात्र संघ चुनावों के लिए भी पहचाना जाता रहा है. लेकिन इस तरह की समृद्ध विरासत के बावजूद सियासी राजनीति की खूरेंजी बुराइयां कभी इस कैंपस में दाखिल नहीं हो सकी जोकि देश के अन्‍य विश्‍वविद्यालयों में काफी पहले ही दाखिल हो गईं.

यहीं पर लेखक यह बताने का प्रयास करता है कि इस दौर में पहली बार सत्‍ता के हस्‍तक्षेप के जरिये इस कैंपस में ऐसा करने का प्रयास हुआ. यहीं पर रचनाकार का क्षोभ, आक्रोश में बदल जाता है जो उसकी विवशता और हताशा का परिणाम है और यहां पर रुककर वह इस यूनिवर्सिटी के गौरवशाली अतीत, लोकतांत्रिक विमर्श, सहमतियों और असहमतियों की लड़ाइयों पर विचार करता हुआ इस थाती को बचाने की गरज से उन साथियों को यह पुस्‍तक समर्पित करता है जिनके लिए लड़ाइयां उनके जीने का सबब रही हैं.

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पुस्‍तक : जेएनयू वाली 'एंटीनेशनल' डायरी
लेखक : मिथिलेश प्रियदर्शी (मूलत: कथाकार हैं और जेएनयू में शोधरत हैं)
प्रकाशक : रीडिंग रूम्‍स प्रकाशन
मूल्‍य : 90 रुपये