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पुस्तक समीक्षा : RSS के बारे में उठे सवालों के जवाब देती है 'द RSS रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी'

सुनील आम्बेकर की पुस्तक – 'द RSS रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी' - उन तमाम विषयों पर संघ की राय स्पष्ट करने का प्रयास करती है, जिन्हें लेकर RSS को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है.

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पुस्तक समीक्षा : RSS के बारे में उठे सवालों के जवाब देती है 'द RSS रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी'

सुनील आम्बेकर की पुस्तक 'द RSS रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी' को 1 अक्टूबर को संघप्रमुख मोहन भागवत दिल्ली में जारी करेंगे

खास बातें

  1. पुस्तक के लेखक ABVP के संगठन महासचिव सुनील आम्बेकर हैं.
  2. इसमें विभिन्न मुद्दों पर RSS की राय स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है.
  3. पुस्तक का विमोचन 1 अक्टूबर को RSS प्रमुख मोहन भागवत दिल्ली में करेंगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में धारणा बनाई गई है कि यह एक रहस्यमयी, गुप्त और भूमिगत संगठन है, जिसके बारे में बाहरी दुनिया को बहुत कम जानकारी है. यह धारणा संगठन के अपने व्यवहार और कार्यकलापों पर पर्दा डाले रखने से भी मजूबत होती आई है. दिलचस्प बात यह है कि RSS भारत के उन गिने-चुने संगठनों में से है, जिनकी स्थापना स्वतंत्रता के पहले हुई. अब जबकि छह साल बाद (संघ की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में विजयादशमी के दिन हुई थी) संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, संघ वह सब कर रहा है, जिससे अपने बारे में बनी कुछ गलत धारणाओं को ठीक कर सके.

यह पहली बार है, जब RSS के एक वरिष्ठ प्रचारक ने एक पुस्तक के माध्यम से संघ के अंदरूनी क्रियाकलाप, उसकी विचारधारा, भारत के प्रति उसकी दृष्टि तथा विभिन्न विषयों पर सोच को सामने रखने का प्रयास किया है. लंबे समय से संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) में संगठन महासचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे सुनील आम्बेकर की पुस्तक – 'द RSS रोडमैप्स फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी' - उन तमाम विषयों पर संघ की राय स्पष्ट करने का प्रयास करती है, जिन्हें लेकर RSS को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है.

आम्बेकर लिखते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम संदर्भ में संघ की सोच शुरू से स्पष्ट रही है. संघ मानता है कि एकं सत्, विप्र: बहुधा वदंति. इसलिए पूजा पद्धति अलग होने के कारण ही भेदभाव नहीं किया जा सकता. आम्बेकर के मुताबिक यह सोच संघ और हिन्दू महासभा के बीच बुनियादी अंतर था. हिन्दू महासभा की सोच थी कि धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जबकि संघ यह मानता था कि चाहे जो धर्म, पंथ या आस्था हो, भारत उन सबका है, जो यहां पैदा हुए और यहां रहते आए हैं. संघ साझा सांस्कृतिक विरासत की बात करता है. इसके लिए आम्बेकर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को उद्धृत करते हैं, जिन्होंने 24 जनवरी, 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में कहा था - "आप मुस्लिम हैं और मैं हिन्दू... हम विभिन्न धर्मों में आस्था रख सकते हैं या फिर किसी में नहीं... लेकिन हमारी सांस्कृतिक विरासत साझा है... इतिहास हमें साथ रखता है, तो फिर वर्तमान या भविष्य अलग क्यों करें...?"


आम्बेकर लिखते हैं कि संघ भारत के धार्मिक आधार पर विभाजन के खिलाफ था और इसीलिए जब गांधी जी ने विभाजन को मंज़ूरी दी, तो संघ ने इस निर्णय की निंदा की. आम्बेकर के मुताबिक, भारत के विभाजन के लिए मुख्य रूप से मुस्लिम लीग जिम्मेदार थी. भारत में रहने वाले मुसलमान किसी अन्य देश में रहने वाले मुसलमानों से बेहतर स्थिति में हैं. उन्हें अधिक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता है. भारत में इस्लाम के विभिन्न पंथ हैं, जो निर्भीक होकर अपनी आस्था के अनुसार उपासना कर सकते हैं, जो इस्लामी देशों में भी संभव नहीं है. आम्बेकर यह भी लिखते हैं कि संघ की सभी शाखाओं में सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया जाता है कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है. आगे लिखा जाता है कि हिन्दू राष्ट्र मुस्लिम विरोधी नहीं है.

पुस्तक कहती है कि हिन्दुत्व की अवधारणा हिन्दू राष्ट्र से जुड़ी है. कई लोग इसे मुस्लिम विरोध के चश्मे से देखते हैं, जो पूरी तरह गलत है. पुस्तक में संघ प्रमुख (सरसंघचालक) मोहन भागवत के हवाले से कहा गया है कि "हमारा देश हिन्दू राष्ट्र है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इसमें मुसलमान शामिल नहीं हैं... जिस दिन यह कहा जाएगा कि मुसलमानों की ज़रूरत नहीं, तब हिन्दुत्व का अस्तित्व मिट जाएगा..."

यह पुस्तक उन आरोपों का भी खंडन करती है कि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था. आम्बेकर लिखते हैं कि स्वयंसेवकों ने गांधी जी की अगुवाई में 'भारत छोड़ो आंदोलन' में हिस्सा लिया था. ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार, नागपुर के नज़दीक अस्ती नामक जगह पर अंग्रेजों ने आठ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटकाया था, जिनमें से दो संघ के स्वयंसेवक थे.

आम्बेकर के मुताबिक यह सच है कि महिलाएं शाखा का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन RSS में कई महिलाएं सक्रिय हैं. संघ की स्थापना के समय से ही महिलाओं के लिए राष्ट्रीय सेविका समिति का गठन हुआ था, जिसके कार्यक्रम, गतिविधियां और विभाग इत्यादि संघ की तरह ही हैं. देशभर में संघ की गतिविधियों में महिलाएं बराबर की भूमिका निभा रही हैं.

भाषा के प्रश्न पर भी इस पुस्तक में संघ की राय स्पष्ट की गई है. पुस्तक कहती है कि संस्कृत शुरू से ही पढ़ाई जानी चाहिए. बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ें और आधुनिक ज्ञान अर्जित करें. संघ मानता है कि भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए संस्कृत और सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. संघ मानता है कि भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और सभी भाषाओं का समान रूप से विकास होना चाहिए.

जम्मू एवं कश्मीर के बारे में पुस्तक में कहा गया है कि आने वाले दिनों में चार बड़े काम बाकी हैं - पहला, विस्थापित कश्मीरी पंडितों की मर्यादा तथा संपत्ति बहाल करना; दूसरा, पाकिस्तान के कब्ज़े वाला कश्मीर वापस लेना; तीसरा, आतंकवाद खत्म करना और चौथा, राज्य का विकास करना.

संघ लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) को सही नहीं मानता. पुस्तक में लिखा गया है कि ऐसे रिश्ते समाज के लिए नकारात्मक रोल मॉडल हैं. ऐसे देश, जहां मजबूत पारिवारिक मूल्य नहीं हैं, वहां लिव-इन रिलेशनशिप को माना जा सकता है, लेकिन भारत में जहां पूरी तरह से सक्रिय पारिवारिक व्यवस्था है, ऐसे संबंधों की ज़रूरत नहीं है. संघ मानता है कि अंतरजातीय विवाहों को लेकर टकराव नहीं होना चाहिए. अगर लड़का और लड़की शादी करने पर अड़े हैं, तो ऐसे में माता-पिता को उन्हें अपना आशीर्वाद दे देना चाहिए.

समलैंगिक संबंधों को लेकर पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था कि समलैंगिकता अपराध नहीं मानी जानी चाहिए. बाद में उन्होंने गे मैरिज पर कहा था कि इसे मान्यता नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि इससे समलैंगिकता को वैधानिकता मिलती है. हालांकि समावेशी होना एक प्रमुख चिंता है. पुस्तक संघप्रमुख मोहन भागवत के हवाले से कहती है कि हर व्यक्ति समाज का हिस्सा है. समाज बदल रहा है और हमें हर किसी को जगह देनी चाहिए, ताकि वे अलग-थलग महसूस न करें.

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आम्बेकर लिखते हैं कि संघ दलगत राजनीति में हिस्सा नहीं लेता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संघ गैर-राजनीतिक है. संघ मानता है कि राजनीति राष्ट्रवादी होनी चाहिए और राजनीतिक कार्य भारतीय संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए. संघ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के काम में दखल नहीं देता. टिकट बंटवारे के समय अगर संघ से राय ली जाती है, तो संघ फीडबैक देता है. इससे आगे चुनाव संबंधी निर्णयों में संघ का दखल नहीं है. यह चुनावी रणनीति तय नहीं करता, जो राजनीतिक दल का काम है. किसी भी BJP सरकार में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक होते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि संघ रोज़मर्रा के काम में दखलअंदाज़ी करता है. वे काम करने के लिए स्वतंत्र हैं. 'संघ का रिमोट कंट्रोल' जैसी कोई चीज़ नहीं है. संघ के पास नियंत्रण का कोई तरीका नहीं है. सरकार संविधान के दायरे में काम करती है. यह नियमों, परम्पराओं से चलती है. यह संसद के ज़रिये जनता के प्रति जवाबदेह है.

सुनील आम्बेकर की इस पुस्तक को 1 अक्टूबर को संघप्रमुख मोहन भागवत दिल्ली में जारी करेंगे. कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन भी मौजूद रहेंगे.



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