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पुस्तक समीक्षा : 'डिजिटल इंडिया और भारत' - तथ्यों की रोशनी में गंभीर विषयों का 'सरल' विश्लेषण

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पुस्तक समीक्षा : 'डिजिटल इंडिया और भारत' -  तथ्यों की रोशनी में गंभीर विषयों का 'सरल' विश्लेषण

डिजिटल दुनिया के बढ़ते स्‍पेस में ब्‍लॉग अनौपचारिक होते हुए भी औपचारिक रूप से एक विधा के रूप में विकसित हो रही है. बनती जा रही है. नतीजतन ब्‍लॉगरों की एक नई जमात उभरी है. हालांकि अभी भी ब्‍लॉग को एक अनौपचारिक विधा के रूप में ही मान्‍यता मिली हुई है. संभवतया उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें ब्‍लॉगर तात्‍कालिकता के दबाव में अपनी बात कहता है. कई बार अपने मनोभावों का यह महज प्रकटीकरण बनकर रह जाता है. इसलिए रचनाधर्मिता के पुट इसमें कई बार आते-आते रह जाते हैं. हालांकि जब इसमें तथ्‍यों को लेकर किसी मुद्दे को पकड़ने की कोशिश की जाती है तो वह ब्‍लॉग अपने समय का सामाजिक दस्‍तावेज भी बन जाता है.

विराग गुप्‍ता इसी दस्‍तावेज सरीखी रचनाधर्मिता के निर्भीक ब्‍लॉगर और लेखक हैं. उनके लेखन की सबसे बड़ी खूबी भी यही है कि वह हिंदी भाषा में मूल तत्‍वों को पकड़कर गहराई में उतरने वाले लेखक हैं और तथ्‍यों और वस्‍तुनिष्‍ठता के आधार पर विश्‍लेषण करने की सामर्थ्‍य रखते हैं. इस मायने में वह इस दौर में अपनी पीढ़ी के लेखकों से थोड़ा अलग हैं. उनकी रचना 'डिजिटल इंडिया और भारत' अपने दौर की बड़ी घटनाओं को इन्‍हीं तथ्‍यों की रोशनी में पेश करती हैं. हालिया दौर में नोटबंदी का फैसला इस देश की सबसे बड़ी घटना और खबर रही है. इसके अलावा कैशलेस लेनदेन, ई-पेमेंट, जीएसटी, गवर्नेंस और न्‍यायिक सुधार आज के दौर के सर्वाधिक चर्चित मसले हैं. इन पर बेहद साफगोई से प्रामाणिक रूप से लिखने का साहस विराग गुप्‍ता ने लिया है. इतने विभिन्‍न विषयों पर एक ही व्‍यक्ति का प्रामाणिक लेखन उसके फलक के विस्‍तार का नमूना भी है. वह इन विषयों के मकड़जाल और उनके पीछे की सच्‍चाईयों को उघाड़कर जनता के सामने रख देते हैं. अपनी लेखनी के माध्‍यम से पाठक के उसके सहज अधिकार से रूबरू कराना इस किताब और लेखक की सबसे बड़ी कामयाबी है.  


आमतौर पर हिंदी में एक 'भेड़चाल' की प्रवृत्ति देखने को मिलती है. किसी विषय पर एक ही किस्‍म का लेखन विभिन्‍न मंचों पर परोसने की प्रवृत्ति दिखती है लेकिन विराग इस मामले में इसलिए औरों से खास हैं कि वह स्‍पष्‍ट रूप से इस भेड़चाल प्रवृत्ति को नहीं स्‍वीकारते. इसके इतर वह विषय से जूझते हैं. निश्चित रूप से विषय के रेशे दर रेशे तक जाने की सामर्थ्‍य और इतनी मेहनत करने का जोखिम आमतौर पर इस गूगल जगत में लेना कोई आम बात नहीं है. विराग सिर्फ ये जोखिम ही नहीं लेते हैं बल्कि अपने पाठकों को साहस के साथ उसके सारगर्भित अर्थों को भी बेहद सरल, सहज अंदाज में पेश करते हैं. वह इस मामले में भी जीवट हैं कि वह सच को बिना लाग-लपेट के पेश कहने का माद्दा भी रखते हैं. यह इस दौर में अपने आप में एक लेखक का विलक्षण गुण है.

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इस कृति डिजिटल इंडिया और भारत में विराग गुप्‍ता ने इन दोनों दुनियाओं के द्वंद्व और अंतर्विरोधों को भी रेखांकित किया है. विराग गुप्‍ता मूलत: संवैधानिक विशेषज्ञ के तौर पर जाने जाते हैं पर इसके साथ वे अर्थशास्‍त्री, साइबर एक्‍सपर्ट और कंज्‍यूमर एक्टिविस्‍ट हैं. उनके लेखन में जनता के लिए प्रतिबद्धता साफ झलकती है. यही उनकी और लेखन की सबसे बड़ी खूबी है.

लेखक: विराग गुप्‍ता
रचना: डिजिटल इंडिया और भारत
प्रकाशक: अनन्‍य प्रकाशन
मूल्‍य: 250 रुपये



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