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वो पहले ही कह गया था- 'तुम मुझे यूं भुला न पाओगे...'

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वो पहले ही कह गया था- 'तुम मुझे यूं भुला न पाओगे...'

साल था 1970 का, अपने समय में छाया हुए एक 'पगला कहीं का' पूरे भरोसे से कह रहा था, 'तुम मुझे यूं भुला न पाओगे...'  ऐसा क्‍या था उसमें, आखिर क्‍यों वह इतने यकीन से कह रहा था कि उसे भुला पाना मुश्किल है. जी हां, आप एकदम सही समझे हैं. हम बात कर रहे हैं मोहम्मद रफी की. 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के अमृतसर में जन्‍मे रफी साहब ने मुंबई आकर साल 1944 में पहली बार हिंदी फिल्म के लिए गीत गाया था और उस फिल्म का नाम था ‘गांव की गोरी’था. आज उनके जन्‍मदिन के मौके पर जानिए उनसे जुड़ी कुछ खास बातें-

- क्‍या आप जानते हैं कि मोहम्‍मद रफी ने तकरीबन 26 हजार गाने गाए थे. साल 1946 में फिल्म 'अनमोल घड़ी' में 'तेरा खिलौना टूटा' से पहचान मिली जिसके बाद उन्‍होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

- उस समय जब रफी गाया करते थे संभवतः वही एकमात्र ऐसे गायक थे, जिन्‍होंने किसी दूसरे प्‍ले-बेक सिंगर के लिए गीत गाए. फिल्म 'रागिनी' में 'मन मोरा बावरा' और फिल्‍म 'शरारत' में 'अजब है दास्तां तेरी यह ज़िंदगी...' गीत किशोर के लिए रफी ने गाए थे.


- कहते हैं कि ऋषि कपूर चाहते थे की फिल्‍म 'लैला मजनू' में किशोर कुमार उनके लिए गीत गाएं, लेकिन मदन मोहन ने मोहम्मद रफी को चुना. रफी को इतना सराहा गया कि इसके बाद रफी ही ऋषि कपूर की आवाज बन गए.

- जब मोहम्मद रफी निधन हुआ, तो मुंबई में खूब बारिश हुई. लोगों ने कहा कि उनकी मौत पर मां सरस्‍वती थी रो रही थीं. उस दिन मुंबई में जोरों की बारिश के बाद भी रफी साहब की अंतिम यात्रा में कम से कम 10000 लोग सड़कों पर थे.

- क्‍या आप जानते हैं कि 'बाबुल की दुआएं लेती जा' गीत को गाते वक्‍त रफी कई बार रोए. इसके पीछे वजह थी कि इस गाने की रिकॉर्डिंग से एक दिन पहले उनकी बेटी की सगाई हुई थी. जिसके चलते रफी साहब काफी भावुक थे. इतनी भावुकता में गाए गए इस गीत के लिए उन्‍हें 'नेशनल अवॉर्ड' मिला.

- रफी साहब को 6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड मिला. भारत सरकार ने उन्‍हें 'पद्म श्री' सम्मान से सम्मानित किया था. रफी ने कई भारतीय भाषाओं में गीत गाए, जैसे- कोंकणी , असामी, पंजाबी, मराठी, उड़िया, बंगाली और भोजपुरी. इसके अलावा रफी साहब ने पारसी, डच, स्पेनिश और इंग्लिश में भी गीत गाए.

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- बहुत ही कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि मोहम्मद रफी का निक नेम ‘फीको’था. बचपन में वे राह चलते फकीरों को सुना करते थे और वहीं से  रफी साहब ने गाना शुरू कर दिया. शायद यही वजह है कि मोहम्मद रफी काफी दयालु भी थे. कहते हैं कि वे गाने के लिए कभी भी फीस लेने पर चर्चा नहीं किया करते थे. कभी-कभी तो 1 रुपये में भी गीत गए दिया करते थे.

- सुरों के सरताज मोहम्मद रफी ने सबसे ज्यादा डुएट गाने आशा भोसले के संग गाए हैं. 31 जुलाई 1980 को मोहम्मद रफी को दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया को अलविदा कह गए.



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